सकीना की चूड़ियां

जब मैं दस साल की थी, मेरी ही उम्र की मेरी एक सहेली थी जिसका नाम सकीना था। जब हम मित्र थे, उस समय मेरे परिवार में छः बेटियां थीं। तब तक मेरे दोनों छोटे भाई पैदा नहीं हुए थे। सकीना सात बड़े और विवाहित बेटों के बाद की एक मात्र बेटी थी। वह हमारे घर के ठीक सामने रहती थी किन्तु उसके पिता बहुत सख़्त थे इसलिए उसे घर से बाहर लम्बे समय तक खेलने की अनुमति नहीं थी। जब वह अपने घर का काम पूरा कर लेती, उसकी मां उसे चुपचाप हमारे पिछवाड़े के अहाते में आने देती। उस समय उसके पिता अपराह्न की झपकी ले रहे होते।

सकीना की चूड़ियां

 

अनुवाद: श्रीविलास सिंह

 

जब मैं दस साल की थी, मेरी ही उम्र की मेरी एक सहेली थी जिसका नाम सकीना था। जब हम मित्र थे, उस समय मेरे परिवार में छः बेटियां थीं। तब तक मेरे दोनों छोटे भाई पैदा नहीं हुए थे। सकीना सात बड़े और विवाहित बेटों के बाद की एक मात्र बेटी थी। वह हमारे घर के ठीक सामने रहती थी किन्तु उसके पिता बहुत सख़्त थे इसलिए उसे घर से बाहर लम्बे समय तक खेलने की अनुमति नहीं थी। जब वह अपने घर का काम पूरा कर लेती, उसकी मां उसे चुपचाप हमारे पिछवाड़े के अहाते में आने देती। उस समय उसके पिता अपराह्न की झपकी ले रहे होते।

एक सूखी हुई जलधारा थी जो हमारे घरों को जोड़ती थी। यह धारा वर्ष में मात्र दो बार जल से भरती और उस समय भी छिछला पानी ही होता।

उस धारा के बगल में सकीना के घर की दीवार में एक संकरा सा छेद था। यह उसके मात्र रेंग कर जाने भर जितना बड़ा था। मेरी बड़ी बहन ने इसे सकीना के लिए खोजा था। जब सकीना अपने पिता के खर्राटों के प्रति निश्चिंत होती, वह हमारी ओर रेंग आती और हमारे साथ खेलती।

मेरे पिता अक्सर व्यवसाय के सिलसिले में यात्रा पर रहते। अपने बच्चों के साथ न बिता पाए समय के एवज वे अपने हर बच्चे के लिए झोला भर खिलौने घर लाते। उन्होंने हमारे पिछवाड़े के आंगन में हमारे लिए एक छोटा सा खिलौना-घर बना रखा था। हम उसे उन खिलौनों से भर देते जो वे हमारे लिए लाते, नन्हें चमकीले खेलने के, खाना बनाने के बर्तन, गुड़ियों के होठों के लिए बने नन्हे प्याले, और कपड़े के टुकड़ों से बनी गुड़िया, जिनकी देह की जगह डंडियां होतीं।

हमारे खेलों में काल्पनिक रात्रिभोज के लिए पत्तियां, बेरी, घास और धूल इकठ्ठा करना सम्मिलित होता। हम अपनी छोटी-छोटी गुड़ियों को लिए रहते मानो वे हमारे बच्चे हों और पूरी सफलता से अपनी मांओं की नक़ल करते। हम सातों का अपनी ही दुनिया में रहते-रहते दिन बीत जाता। एकमात्र ध्वनि जो हमारी कल्पना के कवच को पार कर पाती वह सकीना के पिता के खांसने की आवाज़ होती। यह हमें सदैव इस बात की चेतावनी दे देती कि वे अपनी नींद से जाग चुके हैं और शीघ्र ही सकीना को तलाशने लगेंगे।

सकीना की कलाइयां और टखने खूबसूरत चूड़ियों और पायलों से भरे हुए थे। मेरी बहनें और मैं उसके कंगनों को बहुत प्यार करते थे क्योंकि हमें कभी ऐसा कुछ पहनने की अनुमति नहीं थी जिससे बहुत शोर होता हो। हम अपने पिता की उपस्थिति में गुनगुना और गा भी नहीं सकते थे। इसलिए हम सभी छः बहनें उसके इन संगीतमय गहनों से चमत्कृत थीं, जिन्हें पहनने की हमें मनाही थी। उसकी नक़ल करने हेतु हम अपनी कलाइयों और टखनों में बेलों की लतरें लपेट लिया करते।  कम से कम हम अपने कल्पना के संसार में ही सही सकीना की चूड़ियां और पायलें पहन सकते थे।

एक रात हमें उसके घर सोना पड़ा क्योंकि हमारे माता-पिता को अचानक एक यात्रा पर जाना पड़ गया।

सकीना की मां हमारी दादी के आ जाने तक मेरी बहनों और मेरी देखभाल के लिए राजी हो गयी। यह मात्र दो दिन के लिए था। पहली रात को, सकीना ने अपनी चूड़ियां और पायलें उतार दीं थीं। चूंकि हर कोई सो रहा था, मैं उसके गहनों को पहनने की लालसा को न रोक सकी। मैं धीरे से उसके सोते हुए सिर के पास सरक गयी और बहुत मंद फुसफुसाहट में कहा, “सकीना? सकीना? क्या मैं इन्हें पहन सकती हुं? सकीना? मैं उन्हें बस थोड़ी देर के लिए ही पहनूंगी।” उसने कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि मैंने उसे आधे मन से ही जगाया था ताकि कहीं वह मना न कर दे।

मेरी अंतरात्मा के अनुसार मैंने उससे पूछने का प्रयत्न किया था ताकि मैं उसके गहने पहनने पर अपराधी महसूस न करुँ।

एक कोने में बैठ मैंने उसकी चूड़ियां और पायल पहन लीं। वे मेरी त्वचा पर कितने प्यारे लग रहे थे। कितने भारी! लेकिन वे इसके लायक थे, जितनी बार मैंने हाथ पैर हिलाये वे बज उठे।

“छन! छन! छन!” वे मेरे हाथों पैरों में बजे, जब मैं सोती हुई मेरी बहनों के शरीरों के ऊपर से गुजरी।

छन! छन! छन! चलने और हाथ हिलाने ने मुझे एकाएक महत्वपूर्ण और अर्थवान होने की अनुभूति करा दी। मैं पिछले दरवाजे के पास रुक गयी और आगे पीछे चलने लगी। मैंने अपने पैर को हलके से पटका और चूड़ियों के एक साथ टकराने की आवाज सुनी और ठन्डे आभूषणों को मेरी त्वचा को गरमाते हुए महसूस किया।

छन! छन! छन! अपने संगीत सृजन के दौरान मैंने महसूस किया कि मैंने ढेर सारा पानी पी लिया था और अब उसका परिणाम भुगतने का समय था। मैं अकेले रात को घर से बाहर जाने में बहुत अधिक डरी हुई थी किन्तु मैं अपने छोटे से अपराध के कारण किसी और को जगा भी नहीं सकती थी। मैंने अपनी सारी शक्ति बटोरी और अकेले ही पिछले दरवाजे से बाहर निकल गयी।

छन! छन! छन! मैंने कम से कम इतनी आवाज की जो उस के पिछले अहाते में टहलते या पेड़ की डाल से लटके किसी जिन को डरा कर दूर भगाने को पर्याप्त थी।

छन! छन! छन! इस आवाज में मुझे खुश कर दिया और मैं लगभग भूल सी गयी कि मैं इस सम्पूर्ण अंधकार में टायलेट की तलाश में टहल रही थी। छन! छन! छन! अंततः मैं अपने चलने पर होने वाली मधुर ध्वनि का सकीना की भांति आनंद ले सकती थी। छन! छन! छन! लेकिन वह अपनी चूड़ियों की आवाज को उसके पिता के पास आने की आहट पर बंद करने का प्रयत्न क्यों करती थी? और कभी-कभी उन्हें दीवार के उसकी तरफ वाले छेद में भी डाल दिया करती थी।

छन! छन! छन! क्या वह नहीं चाहती कि हम उनके साथ खेलें?

छन! छन! छन! क्या वह सोचती थी कि हम उन्हें तोड़ देंगे ?

छन! छन! छन! अकस्मात् पूर्ण निश्तब्धता के मध्य गोली चलने की तीन आवाजें हवा में गूंजी और ऐसे आवाज आयी मानों आसमान तीन टुकड़ों में विखंडित हो गया हो। मैं फर्श पर लुढ़क गयी और मैंने अपने कपड़े गीले कर लिए।

सकीना के पिता छत पर से पश्तो में चिल्लाये, “तुम अकेले कहां जा रही हो सकीना? तुरंत घर के भीतर वापस जाओ ! तुम्हारी मां तुम्हारे साथ क्यों नहीं है?”

गोली चलने की आवाजों के कारण सारा घर जाग गया था, मेरी शर्मिंदगी को बढ़ाते हुए मेरी सभी बहनें, सकीना, उसकी मां और उसके पिता को भी मेरे अपराध का पता चल गया। मैंने अपनी कंपकपाती आवाज में मुश्किल से दारी में कहा, “अंकल, यह मैं हूं, शिरीन गुल। मैं किसी को जगाना नहीं चाहती थी।  मुझे कुछ हड़बड़ी थी।”

“शिरीन गुल?” सकीना के परेशान पिता ने कहा, “ओह! मुझे माफ़ करना मेरी जान, तुम सकीना की तरह महसूस हुई और मुझे गुस्सा आ गया क्योंकि उसे अंधेरे में अकेले घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं है। तुम्हें अपने साथ के लिए अपनी किसी बहन को जगा लेना चाहिए था।”

सकीना और उसकी मां हंसने लगीं क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले मेरे चहरे के डरे हुए भाव देखे थे। जल्दी ही मेरी प्यारी बहनें भी हंस रही थी यद्यपि मेरी सबसे बड़ी बहन ने मुझे गले लगा लिया। मैं इस सारी हंसी के मध्य हिलने की जुर्रत न कर सकी। मैं उस मजाक में मेरे स्कर्ट से ढके गीले कपड़ों को दिखा कर और कुछ नहीं जोड़ना चाहती थी।

मैं वहीँ अपने चहरे को अपनी हथेलियों से ढके खड़ी रही और उंगलियों के मध्य से झांकती रही।

उस रात्रि मैंने सकीना द्वारा चूड़ियों की आवाज को बंद करने और उन्हें छिपा देने का रहस्य जान लिया। जब तक वह चूड़ियां पहने रहती थी, जिनसे उसकी मां के आभूषणों से बिलकुल अलग ध्वनि निकलती थी, उसके पिता जान जाते थे कि वह कहां है।

जब हमारी दादी हमें सकीना के घर से अपने घर ले आयीं उन्हें सारी कहानी बताई गयी। मेरी अन्यथा गंभीर रहने वाली दादी तब तक हंसती रहीं जब तक उनकी आंखों में आंसू न आ गए। मैं अपनी दादी के मुझे लेने आने तक शर्मिंदगी के मारे सकीना के कपड़ों की अलमारी के पीछे छुपी रही थी। मेरे सौभाग्य से सकीना ने मुझे उसके आभूषण पहनने के लिए माफ़ कर दिया था। वस्तुतः उसने कहा कि मुझे बस कहने भर की देर थी, वह उन्हें स्वयं मेरी कलाई में पहना देती। वह मेरी सबसे अच्छी सहेली थी और इस घटना ने हमें एक दूसरे का और प्रिय बना दिया।

घर पर मुझे दादी ने थोड़ा डांटा और मुझे ले कर परचून की दूकान तक गयीं।  उन्होंने कहा कि मेरे अपराध की सजा यह है कि मैं दूकान से सामान उठा कर घर तक ले आऊं। हम जब बाजार गए तो सब्जियों की दुकान की तरफ नहीं गए बल्कि वे मुझे सीधे उस नाटे आदमी के पास ले गयीं जो चूड़ियां और पाजेब बेचा करता था। आश्चर्य से स्तब्ध, मैंने लालच वश अपनी पूरी बांह भर चमकीली गुलाबी चूड़ियां पहन ली और अपनी दादी का हाथ चूम लिया।

वे स्वयं से खुश थीं। उन्होंने मेरी हर बहन के लिए एक एक सेट पसंद किया। जब हम घर गए और सब को उपहार बांटा, मैं और मेरी बहनें इतने आनंदातिरेक में थीं कि हम मुश्किल से यह ख़ुशी छुपा पा रहे थे।  हम अपने घर के हर कमरे में चूड़ियां खनकाते घूम रहे थे। हम ने अपनी चूड़ियां दीवार के सकीना की तरफ वाले हिस्से में खनखनायीं और उसे पुकारा। खनखनाहट के कारण सकीना भी अपनी चूड़ियां पहने रह सकती थी और अपने पिता के तेज कानों द्वारा न पहचानी जाती। हमारे आंगन में इतनी आवाज होती थी कि उन्हें भान भी नहीं होता था कि वह अपने काम करने की बजाय हमारे साथ खेल रही है।

मैं और मेरी बहनें जानती थी कि यह सब तभी तक चलेगा जब तक हमारे माता-पिता लौट नहीं आते। हमारे मां-बाप ने हमें हमारी तेज खनखनाहट के मध्य ही आ कर आश्चर्यचकित कर दिया। पहले पहल मेरे पिता बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने अपनी छः संगीतमय पुत्रियों को पीट पीट कर अस्तव्यस्त और टूटी हुई चूड़ियों की एक गेंद बना देने के लिए अपना हाथ उठाया। हम सब रंगे हाथ पकड़ी गयीं थीं और उनके गुस्से से डरी हुईं थीं लेकिन दादी ने उनके हाथ को रोकने के लिए अपनी छड़ी की एक तेज चाल से हमें बचा लिया। फिर उन्हें बड़े आराम से बताया कि सकीना के घर क्या हुआ था। मेरी शर्मिंदगी बढ़ाते हुए उन्होंने यह विवरण बताने से भी परहेज नहीं किया कि किस प्रकार मैंने सकीना के पिता के डर से अपने कपड़े गीले कर लिए थे। किसी तरह दादी की कहानी ने उनका गुस्सा दूर कर दिया और कुछ ही समय पश्चात् हमारे मां-बाप मुस्करा रहे थे। हमारे पिता ने हमें चूड़ियां पहनने की अनुमति दे दी और उनके शोर के प्रति एक शब्द भी नहीं कहा। किन्तु हम सब को पता था कि एक दिन जब हमारी शीशे की चूड़ियां टूट जाएंगी (दादी ने सोने की चूड़ियां नहीं दिलवायीं थी) वे उन्हें दोबारा नहीं खरीदेंगे।

वर्ष गुजरते रहे, मैं और सकीना सबसे अच्छे मित्र बने रहे। मेरी शादी की रात के पूर्व उसने चूड़ियों की कहानी मेरे हाथों में मेहंदी लगाती हुई महिलाओं को सुनाई। उसने इसे मेरी याददाश्त से भी अधिक रंगीन तरीके से बताया।  मैंने अपना चेहरा अपने परदे में छुपा लिया लेकिन मुझे भी उस कहानी में औरों की तरह बहुत आनंद आया। किसी तरह यह कहानी मेरे पति को भी पता चल गयी। शायद उनकी छोटी बहन ने इसे उनसे जोड़ लिया था। हमारे हनीमून की दूसरी रात उन्होंने मुझे सोने की चूड़ियों के दो सेट और हाथ से बनीं सोने की दो पाज़ेबों के उपहार से चौंका दिया। मैं उनके इस उपहार से रोमांचित थी। उन्होंने कहा कि वे मुझे प्रसन्न करना चाहते थे और मेरी बांहों को कलाई से कुहनी तक चूड़ियों से भर देना चाहते थे। मैं अब सोचती हूं कि यह उपहार वे शायद सकीना के पिता से मिली सीख के कारण लाये थे।

 

 

ज़ोहरा सईद
ज़ोहरा सईद

ज़ोहरा सईद एक अफ़ग़ान कहानीकार और कवयित्री हैं और वे ब्रुकलिन, अमेरिका में रहती हैं। उनकी यह कहानी पहली बार 1998 में अफ़ग़ान कम्यूनिकेटर में लेखिका के छद्म नाम रेहान के नाम के साथ प्रकाशित हुई थी। इसका पुनर्प्रकाशन 1999 में लेमर-अफ़ग़ान पत्रिका में हुआ। ज़ोहरा सईद एक अफ़ग़ान कहानीकार और कवयित्री हैं और वे ब्रुकलिन, अमेरिका में रहती हैं। उनकी यह कहानी पहली बार 1998 में अफ़ग़ान कम्यूनिकेटर में लेखिका के छद्म नाम रेहान के नाम के साथ प्रकाशित हुई थी। इसका पुनर्प्रकाशन 1999 में लेमर-अफ़ग़ान पत्रिका में हुआ।