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वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर | Waqt Hamare Saath Nahi Hai Aukaat Aur Kashmir Hindi Translation

वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर

हम सब हिंदुस्तानी जानते हैं कि हमारी संस्कृति में औक़ात देखने-दिखाने की क्या अहमियत है। बचपन से ही हम लोगों को ऊँचा-नीचा दिखाना शुरू कर देते हैं और हर किसी से पूछते चलते हैं, साले तेरी औक़ात क्या है? हर व्यक्ति को सामाजिक पदानुक्रम में उसकी सही जगह दिखाना और अत्यंत हिंसा के साथ उसे आजीवन और पीढ़ियों तक वहीं दबाए रखना हमारी महान संस्कृति का मूल है। हमारी पहचान ही जातिवादी है और इसलिए हम दिनभर, सालों-साल एक दूसरे की औक़ात ही आंकते रहते हैं। किसी बाहर के व्यक्ति के लिए ये समझना मुश्किल है कि हम इस ऊँच-नीच की प्रक्रिया में अपना जीवन क्यों नष्ट कर देते हैं, क्यों हम किसी भी चीज़ को बराबरी की नज़र से नहीं देख पाते, क्यों हम इंसान कहलाने लायक़ नहीं हैं? उनके लिए ये भी समझना मुश्किल है कि हमारा रवैया पूरे वक़्त इतना हिंसक क्यों रहता है? इसीलिए कश्मीरी भी ये नहीं समझ पाते की हम उनके साथ ऐसा सुलूक आख़िर क्यों कर रहे हैं और कैसे कर सकते हैं, क्या हमारे पूरे समुदाय में कोई इंसानियत ही नहीं है? एक कश्मीरी लेखक ने हमारे अंदर औक़ात के जुनून को सही समझा है, उसे हमारी जातिवादी प्रकृति से जोड़ा है और दिखाया है कि हिंदुस्तान कश्मीर के साथ अमानवीय और घिनौनी तरह से क्यों पेश आता है। ये लेख हमारी मानसिकता में जड़ बसाया हुआ कचरा और कीचड़ दिखाता है। ज़रूर पढ़िए।

नईम राथर
‘आवाम हमारे साथ है’: मसारत आलम भट्ट का इंटरव्यू | Awaam Hamare Saath Hain Masarat Alam Bhatt Interview Hindi Translation

‘आवाम हमारे साथ है’: मसारत आलम भट्ट का इंटरव्यू

कश्मीर में 2008 में हुए अमरनाथ भूमि आंदोलन के बाद सात बार सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिए जा चुके मसारत आलम भट्ट को इसी साल जून में जेल से रिहा किया गया। तेज़-तर्रार अंग्रेजी बोलने वाले साइंस ग्रेजुएट भट्ट अब भारत के खिलाफ कश्मीर छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसने केन्द्रीय और राज्य सरकारों की नींद हराम कर रखी है। वर्तमान में अन्डरग्राउन्ड हुए मुस्लिम लीग के लीडर ने इस आंदोलन की शुरुआत साप्ताहिक ‘विरोध कैलेंडर’ जारी करने के साथ की थी। 11 जून 2010 को सुरक्षा बलों द्वारा एक किशोर की हत्या के बाद शुरू हुए हाल ही के विरोध प्रदर्शनों में उन्होंने घाटी में व्यापक हड़ताल का आह्वान किया था। इस विशेष इंटरव्यू में दिलनाज़ बोगा कश्मीर के मोस्ट वांटेड आदमी के साथ कुछ नई-पुरानी बातें करती हैं।

मसारत आलम भट्ट

कहानियाँ

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देहाती डॉक्टर

देहाती डॉक्टर | Dehati Doctor Franz Kafka Hindi Translation

देहाती डॉक्टर

‘देहाती डॉक्टर’ फ्रैंज़ काफ़्का की प्रसिद्ध लघुकथा है, जो पहली बार 1919 में प्रकाशित हुई थी। यह कहानी एक ग्रामीण डॉक्टर की एक रात की असामान्य यात्रा के ज़रिये आधुनिक समाज में इंसान की बेबसी, ज़िम्मेदारी के बोझ और अस्तित्व की विडंबनाओं को उजागर करती है। एक रोगी के बुलावे पर डॉक्टर घर से निकलता है, लेकिन यह यात्रा जल्द ही एक अतियथार्थवादी (surreal) अनुभव में बदल जाती है — जहाँ समय, नैतिकता, और इच्छाओं की सीमाएँ धुंधली पड़ जाती हैं। कहानी प्रतीकों और रूपकों से भरी हुई है — जैसे असंभव गति से दौड़ती घोड़ा-गाड़ी, नौकरानी पर संकट, रोगी का रहस्यमयी घाव, और समुदाय का विवेकहीन व्यवहार — जो काफ़्का की विशिष्ट शैली ‘काफ़्कायन’ का हिस्सा हैं। यह सिर्फ़ एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की कहानी है जो अपने कर्तव्यों, समाज की अपेक्षाओं और निजी विवेक के बीच फँसा हुआ है।

फ़्रांज काफ़्का

बाहर कुछ जल रहा है

वह किसी जल-पक्षी की तरह पतला-दुबला था और उसके कंधे झुके हुए थे। उसके डरावने, मरियल चेहरे पर दो गहरी भूरी जलती हुई आंखें मौजूद थीं। वे वाक़ई जलती हुई आंखें थीं—किसी अंदरूनी आग से जलती हुई आंखें नहीं, बल्कि केवल प्रतिबिम्बित करती हुईं, जैसे वे दो स्थिर आइने हों, जो यह बता रहे हों कि बाहर कुछ जल रहा है।

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लेख

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वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर | Waqt Hamare Saath Nahi Hai Aukaat Aur Kashmir Hindi Translation

वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर

हम सब हिंदुस्तानी जानते हैं कि हमारी संस्कृति में औक़ात देखने-दिखाने की क्या अहमियत है। बचपन से ही हम लोगों को ऊँचा-नीचा दिखाना शुरू कर देते हैं और हर किसी से पूछते चलते हैं, साले तेरी औक़ात क्या है? हर व्यक्ति को सामाजिक पदानुक्रम में उसकी सही जगह दिखाना और अत्यंत हिंसा के साथ उसे आजीवन और पीढ़ियों तक वहीं दबाए रखना हमारी महान संस्कृति का मूल है। हमारी पहचान ही जातिवादी है और इसलिए हम दिनभर, सालों-साल एक दूसरे की औक़ात ही आंकते रहते हैं। किसी बाहर के व्यक्ति के लिए ये समझना मुश्किल है कि हम इस ऊँच-नीच की प्रक्रिया में अपना जीवन क्यों नष्ट कर देते हैं, क्यों हम किसी भी चीज़ को बराबरी की नज़र से नहीं देख पाते, क्यों हम इंसान कहलाने लायक़ नहीं हैं? उनके लिए ये भी समझना मुश्किल है कि हमारा रवैया पूरे वक़्त इतना हिंसक क्यों रहता है? इसीलिए कश्मीरी भी ये नहीं समझ पाते की हम उनके साथ ऐसा सुलूक आख़िर क्यों कर रहे हैं और कैसे कर सकते हैं, क्या हमारे पूरे समुदाय में कोई इंसानियत ही नहीं है? एक कश्मीरी लेखक ने हमारे अंदर औक़ात के जुनून को सही समझा है, उसे हमारी जातिवादी प्रकृति से जोड़ा है और दिखाया है कि हिंदुस्तान कश्मीर के साथ अमानवीय और घिनौनी तरह से क्यों पेश आता है। ये लेख हमारी मानसिकता में जड़ बसाया हुआ कचरा और कीचड़ दिखाता है। ज़रूर पढ़िए।

नईम राथर
‘आवाम हमारे साथ है’: मसारत आलम भट्ट का इंटरव्यू | Awaam Hamare Saath Hain Masarat Alam Bhatt Interview Hindi Translation

‘आवाम हमारे साथ है’: मसारत आलम भट्ट का इंटरव्यू

कश्मीर में 2008 में हुए अमरनाथ भूमि आंदोलन के बाद सात बार सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिए जा चुके मसारत आलम भट्ट को इसी साल जून में जेल से रिहा किया गया। तेज़-तर्रार अंग्रेजी बोलने वाले साइंस ग्रेजुएट भट्ट अब भारत के खिलाफ कश्मीर छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसने केन्द्रीय और राज्य सरकारों की नींद हराम कर रखी है। वर्तमान में अन्डरग्राउन्ड हुए मुस्लिम लीग के लीडर ने इस आंदोलन की शुरुआत साप्ताहिक ‘विरोध कैलेंडर’ जारी करने के साथ की थी। 11 जून 2010 को सुरक्षा बलों द्वारा एक किशोर की हत्या के बाद शुरू हुए हाल ही के विरोध प्रदर्शनों में उन्होंने घाटी में व्यापक हड़ताल का आह्वान किया था। इस विशेष इंटरव्यू में दिलनाज़ बोगा कश्मीर के मोस्ट वांटेड आदमी के साथ कुछ नई-पुरानी बातें करती हैं।

मसारत आलम भट्ट
हिंदुत्व की राजनीति और औरंगज़ेब का पुनर्जन्म | Hindutva Ki Rajneeti Aur Aurangzeb Ka Punarjanam Hindi Translation Anand Teltumbde

हिंदुत्व की राजनीति और औरंगज़ेब का पुनर्जन्म

हर शासक की तरह औरंगज़ेब न तो कोई नैतिक आदर्श थे, न ही महज़ एक खलनायक। एक राजा की तरह उन्होंने भी अपनी प्रजा के प्रति ज़िम्मेदारी को आत्मसात किया था। लेकिन इन सब तथ्यों से इतर, यह भी सच है कि औरंगज़ेब की मृत्यु को तीन सौ साल से ज़्यादा हो चुके हैं। आज उनके ख़िलाफ़ चलाया जा रहा यह अत्यधिक दुश्मनी से भरा अभियान एक अजीब विडंबना को जन्म देता है—वह यह कि यह अभियान खुद उसी विकृत छवि को दोहराता है, जो सत्ता में बैठे लोग औरंगज़ेब को लेकर गढ़ते आए हैं। देश की असली समस्याओं को सुलझाने और देश की सामूहिक ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में मोड़ने के बजाय, हमारे नेतृत्व का ध्यान इस समय औरंगज़ेब की क़ब्र पर बहस करने और मस्जिदों के नीचे मंदिर खोजने में लगा हुआ है।

आनंद तेलतुंबडे
पैदा होने की असुविधा - अध्याय 1 | The Trouble With Being-born Hindi Translation Emil Cioran

पैदा होने की असुविधा - अध्याय 1

एमिल सिओरन की पुस्तक 'The Trouble with Being Born' एक गहन दार्शनिक रचना है जिसमें उन्होंने अस्तित्व और जन्म की विडंबनाओं पर विचार किया है। इस पुस्तक में सिओरन ने जीवन की अनिवार्यता और उसके साथ जुड़ी व्यर्थता का विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, जन्म लेना एक प्रकार की त्रासदी है, और वे इस बात को विभिन्न आत्म-मननशील और निराशावादी टिप्पणियों के माध्यम से प्रकट करते हैं। इस पुस्तक में दर्शाए गए विचार जीवन के प्रति एक गहरी संवेदनशीलता और अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं, जिससे यह दर्शन के छात्रों और विचारशील पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण पठन बन जाता है। यह उस पुस्तक का पहला अध्याय है।

एमिल सिओरन

अनुवादक

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सुशांत सुप्रिय

हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार, कवि तथा साहित्यिक अनुवादक। इनके नौ कथा-संग्रह , पाँच काव्य-संग्रह तथा विश्व की अनूदित कहानियों के दस संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी कहानियाँ और कविताएँ पुरस्कृत हैं और कई राज्यों के स्कूल-कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में बच्चों को पढ़ाई जाती हैं। कई भाषाओं में अनूदित इनकी रचनाओं पर कई विश्वविद्यालयों में शोधार्थी शोध-कार्य कर रहे हैं। इनकी कई कहानियों के नाट्य मंचन हुए हैं तथा इनकी एक कहानी “दुमदार जी की दुम “ पर फ़िल्म भी बन रही है। हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी व पंजाबी में भी लेखन व रचनाओं का प्रकाशन । साहित्य व संगीत के प्रति जुनून ।सुशांत सरकारी संस्थान, नई दिल्ली में अधिकारी हैं और इंदिरापुरम्, ग़ाज़ियाबाद में रहते हैं।

शहादत

शहादत ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंबेडकर कॉलेज से बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता में किया। दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही देशबंधु कॉलेज से एम.ए. (हिंदी) किया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में प्रुफ रीडर, हिंदी टाइपिस्ट और अनुवादक की पोस्ट से की। इसके बाद वह दो साल एनडीटीवी इंडिया में कार्यरत रहे। वर्तमान में वह फ्रीलांस ‘इंग्लिश से हिंदी’ और ‘उर्दू से हिंदी’ अनुवादक के तौर पर काम करते हैं। गुजिश्ता सालों में इनकी कहानियां हिंदी साहित्य की चर्चित और स्थापित पत्रिकाओं हंस, कथादेश, कथाक्रम, पहल, मधुमति, वनमाली, विभोम स्वर, नया ज्ञानोदय, जानकीपुल.कॉम, समालोचन.कॉम, उद्भावना, माटी, पाखी, परिकथा और अहा!ज़िंदगी में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कहानियों के अनुवाद अंग्रेजी की प्रसिद्ध पत्रिकाओं ‘आउट ऑफ प्रिंट’ और ‘बॉम्बे लिटरेरी मैगजीन’ में प्रकाशित हो चुके हैं। शहादत का कहानी संग्रह ‘आधे सफ़र का हमसफ़र’ प्रकाशित हो चुका है। इनका दूसरा कहानी संग्रह ‘कर्फ़्यू की रात’ लोकभारती प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशय है। अनुवादक के तौर पर शहादत ने हिजाब इम्तियाज़ अली की कहानियों के संग्रह सनोबर के साए और ज़हीर देहलवी की आत्मकथा दास्तान-ए-1857, जो पहले स्वतंत्रता संग्राम पर लिखी गई ऐतिहासिक किताब है, का उर्दू से हिंदी अनुवाद किया है। उन्होंने मकरंद परांजपे की किताब ‘गांधी की हत्या और उसके बाद का उनका जीवन’ का भी अनुवाद किया है, जो पेंग्विन इंडिया से शीघ्र प्रकाशय है।

सौरभ कुमार

सौरभ कुमार पेशे से पत्रकार और दिल्ली के एक स्कूल में सिनेमा पढ़ाने का काम करते है। सौरभ कुमार ओपिया फिल्म्स के संस्थापक और बोलती मीडिया फाउंडेशन के सह-संस्थापक हैं। वे मुंबई, भारत में रहने वाले सात साल से ज़्यादा के अनुभव वाले मल्टीमीडिया पत्रकार, कंटेंट क्रिएटर और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता हैं। उन्होंने पब्लिक बोलती की भी सह-स्थापना की, जो एक नागरिक पत्रकारिता और वकालत मंच है, जिसने कोविड-19 महामारी के दौरान प्रवासी मज़दूरों के लिए धन जुटाने में मदद की, यात्री ट्रेनों में उनके लिए भोजन जुटाया, ईंट भट्टों से बंधुआ मज़दूरों को बचाया और विशिष्ट स्थानों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों से जवाबदेही सुनिश्चित की। वे भारत में औपनिवेशिक युग के राजद्रोह कानून के बारे में एक ब्लॉग, रिपील सेडिशन पहल का भी हिस्सा थे। उनके बारे में और उनके काम को और जान्ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: https://opiafilms.com/