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नईम राथर|Nayeem Rather

नईम राथर

नईम राथर फ्रीलान्स कश्मीरी जर्नलिस्ट हैं। वह कहानीकार बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। वह मोबी डिक और ऑस्टेर्लित्ज़ के प्रशंसक हैं।

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मकबूल भट्ट को कैसे याद करता है त्रेहगाम|Kaise Trehgam Maqbool Bhatt Ko Yaad Karta Hai Hindi Translation

मकबूल भट्ट को कैसे याद करता है त्रेहगाम

शहीद-ए-आज़म और बाबा-ए-कौम मकबूल भट्ट को हिंदुस्तान की सरकार ने 11 फरवरी 1984 को तिहाड़ जेल में फांसी दे दी थी। वह कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के एक छोटे से गांव त्रेह्गाम से थे, लेकिन आज़ादी की चाह और अपनी मातृभूमि से मोहब्बत के चलते आज वह दुनिया के इस सबसे संघर्षीय और सघन फौजी इलाके से निकलकर विश्व भर में किसी धूमकेतू की तरह प्रकाशमान हैं। हिंदुस्तान में यह भ्रम फैलाया जाता है कि कश्मीर में आज़ादी का संघर्ष पाकिस्तानी चलाते हैं और ज़मीनी स्तर पर आम कश्मीरी जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है। इस लेख को पढ़ने के बाद उम्मीद है कि यह गलतफहमी कुछ हद तक दूर हो सकेगी। इस लेख में आप पढ़ सकते हैं कि मक़बूल को उनके खुद के गांव में आज भी कैसे याद किया जाता है। इससे आपको मक़बूल के लिए लोगों में जो सम्मान और प्यार है, उसका अंदाज़ा होगा। अपनी शहादत के बाद मकबूल भट्ट कश्मीरी आवाम के दिलों में इस तरह जगह बना गए हैं कि आज भी लोग बुरहान वानी जैसे क्रांतिकारियों की तुलना मकबूल भट्ट से करके उनकी प्रशंसा करते हैं। आम कश्मीरियों के बीच यह प्यार और सम्मान सिर्फ मक़बूल के लिए ही नहीं है, बल्कि उन सभी कश्मीरियों के लिए भी है जिन्होंने कश्मीर के ऊपर हिंदुस्तान का कब्ज़ा ख़त्म करने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली और गंवाई भी।

February 11, 2022
वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर|Waqt Hamare Saath Nahi Hai Aukaat Aur Kashmir Hindi Translation

वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर

हम सब हिंदुस्तानी जानते हैं कि हमारी संस्कृति में औक़ात देखने-दिखाने की क्या अहमियत है। बचपन से ही हम लोगों को ऊँचा-नीचा दिखाना शुरू कर देते हैं और हर किसी से पूछते चलते हैं, साले तेरी औक़ात क्या है? हर व्यक्ति को सामाजिक पदानुक्रम में उसकी सही जगह दिखाना और अत्यंत हिंसा के साथ उसे आजीवन और पीढ़ियों तक वहीं दबाए रखना हमारी महान संस्कृति का मूल है। हमारी पहचान ही जातिवादी है और इसलिए हम दिनभर, सालों-साल एक दूसरे की औक़ात ही आंकते रहते हैं। किसी बाहर के व्यक्ति के लिए ये समझना मुश्किल है कि हम इस ऊँच-नीच की प्रक्रिया में अपना जीवन क्यों नष्ट कर देते हैं, क्यों हम किसी भी चीज़ को बराबरी की नज़र से नहीं देख पाते, क्यों हम इंसान कहलाने लायक़ नहीं हैं? उनके लिए ये भी समझना मुश्किल है कि हमारा रवैया पूरे वक़्त इतना हिंसक क्यों रहता है? इसीलिए कश्मीरी भी ये नहीं समझ पाते की हम उनके साथ ऐसा सुलूक आख़िर क्यों कर रहे हैं और कैसे कर सकते हैं, क्या हमारे पूरे समुदाय में कोई इंसानियत ही नहीं है? एक कश्मीरी लेखक ने हमारे अंदर औक़ात के जुनून को सही समझा है, उसे हमारी जातिवादी प्रकृति से जोड़ा है और दिखाया है कि हिंदुस्तान कश्मीर के साथ अमानवीय और घिनौनी तरह से क्यों पेश आता है। ये लेख हमारी मानसिकता में जड़ बसाया हुआ कचरा और कीचड़ दिखाता है। ज़रूर पढ़िए।

May 24, 2026