वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर
हम सब हिंदुस्तानी जानते हैं कि हमारी संस्कृति में औक़ात देखने-दिखाने की क्या अहमियत है। बचपन से ही हम लोगों को ऊँचा-नीचा दिखाना शुरू कर देते हैं और हर किसी से पूछते चलते हैं, साले तेरी औक़ात क्या है? हर व्यक्ति को सामाजिक पदानुक्रम में उसकी सही जगह दिखाना और अत्यंत हिंसा के साथ उसे आजीवन और पीढ़ियों तक वहीं दबाए रखना हमारी महान संस्कृति का मूल है। हमारी पहचान ही जातिवादी है और इसलिए हम दिनभर, सालों-साल एक दूसरे की औक़ात ही आंकते रहते हैं। किसी बाहर के व्यक्ति के लिए ये समझना मुश्किल है कि हम इस ऊँच-नीच की प्रक्रिया में अपना जीवन क्यों नष्ट कर देते हैं, क्यों हम किसी भी चीज़ को बराबरी की नज़र से नहीं देख पाते, क्यों हम इंसान कहलाने लायक़ नहीं हैं? उनके लिए ये भी समझना मुश्किल है कि हमारा रवैया पूरे वक़्त इतना हिंसक क्यों रहता है? इसीलिए कश्मीरी भी ये नहीं समझ पाते की हम उनके साथ ऐसा सुलूक आख़िर क्यों कर रहे हैं और कैसे कर सकते हैं, क्या हमारे पूरे समुदाय में कोई इंसानियत ही नहीं है? एक कश्मीरी लेखक ने हमारे अंदर औक़ात के जुनून को सही समझा है, उसे हमारी जातिवादी प्रकृति से जोड़ा है और दिखाया है कि हिंदुस्तान कश्मीर के साथ अमानवीय और घिनौनी तरह से क्यों पेश आता है। ये लेख हमारी मानसिकता में जड़ बसाया हुआ कचरा और कीचड़ दिखाता है। ज़रूर पढ़िए।
May 24, 2026