किस चीज़ से डरते हैं वे?

"वे डरते हैं / किस चीज़ से डरते हैं वे / तमाम धन-दौलत / गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद? / वे डरते हैं / कि एक दिन / निहत्थे और ग़रीब लोग / उनसे डरना / बंद कर देंगे।" गोरख पाण्डेय की क्रांतिकारी कविता के ये अमर शब्द हिंदुस्तान की सड़कों से लेकर मेक्सिको के जंगलों तक अलग-अलग आवाज़ों में गूंजते हैं। इनमें से एक सबकमानदांते मार्कोस की आवाज़ भी है, जो कहती है, “आज नहीं तो कल अमरीकी सरकार के समर्थन के बावजूद, लाखों डॉलर खर्चने के बावजूद, सैकड़ों झूठ फैलाने के बावजूद, जो तानाशाही मैक्सिको के आसमान में काले बादल की तरह छाई हुई है, उसका अंत जरूर होगा। मैक्सिको की जनता जरूर कोई तरीका ढूंढ निकालेगी, जिससे वह लोकतंत्र, स्वतंत्रता और न्याय के अपने ऐतिहासिक अधिकारों पर दावा कर सके।” आज नहीं तो कल हिन्दुस्तानी सरकार के दमन के बावजूद, करोड़ों रुपए खर्चने के बावजूद, सैकड़ों झूठ फैलाने के बावजूद, जो तानाशाही हिंदूओं और उनकी हिन्दुस्तानी सरकार ने कश्मीर, ब्रह्मपुत्र बेसिन और इंडियन उपमहाद्वीप के अन्य लोगों पर जमाई हुई है, उसका अंत भी जरूर होगा। इन सब जगहों की जनता जरूर कोई न कोई तरीका ढूंढ निकालेगी, जिससे वह लोकतंत्र, स्वतंत्रता और न्याय के अपने ऐतिहासिक अधिकारों पर दावा कर सके और तथाकथित हिंदू सभ्यता का पूर्ण विनाश कर सके। इस लेख में आप मेक्सिको के ही नहीं, दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले आज़ादी-परस्त मनुष्य की आवाज सुन सकते हैं, चाहे वह मकबूल भट्ट हो, चे ग्वेरा हो, गोरख पाण्डेय या फिर मैल्कम एक्स ही क्यों न हो।

किस चीज़ से डरते हैं वे?

  पटचित्र: Human Misery (detail), by Paul Gauguin, 1898–99. The Metropolitan Museum of Art, Elisha Whittelsey Collection, Elisha Whittelsey Fund, 1952.

अनुवाद: अक्षत जैन और अंशुल राय
स्त्रोत: Lapham’s Quarterly
प्रकाशन तिथी: 1995

 

एक पड़ोसी की टिप्पणी 

अमरीका की आवाम के लिए:

अमरीकी सरकार अपनी विदेश नीति में बारम्बार गलत साबित हुई है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वह गलत आदमी की हिमायत करती है। इतिहास में इसके अनगिनत उदाहरण हैं।

इस दशक की शुरुआत में अमरीकी सरकार ने कार्लोस सलिनस दे गोर्टारी का समर्थन करने की गलती की। उसने नाफ़्टा पर हस्ताक्षर कर गलती की, जिसको उत्तर अमेरिका के अधिकतर लोगों का समर्थन प्राप्त नहीं था, और जिसके चलते मेक्सिको के आदिवासियों का कत्लेआम शुरू हुआ।

1994 की सुबह हम लोगों ने हथियार उठा लिए। हम लोगों ने हथियार सत्ता की चाहत में नहीं उठाए और न ही किसी विदेशी अधिदेश के जवाब में उठाए। हमने हथियार उठाए तो सिर्फ यह बताने के लिए कि, ‘हम यहां हैं।’

मैक्सिकन सरकार, हमारी सरकार, हमें भूल गई थी और बिना गोला-बारूद के हमारा नरसंहार करने के लिए एकदम तैयार खड़ी थी; वह हमारा विनाश बीमारी, कष्ट और गुमनामी जैसे खामोश हत्यारों से करने के लिए तैयार थी। अमरीकी सरकार इस नरसंहार  में मैक्सिकन सरकार का साथ दे रही थी। नाफ़्टा पर दस्तखत करने के साथ ही अमरीकी सरकार लाखों मैक्सिकन की हत्या की जिम्मेदार बनी और इतना ही नहीं इ सबका उसने अनुमोदन भी किया। क्या अमरीकी जनता को यह पता था? क्या उन्हें पता था कि उनकी सरकार एक ऐसे समझौते पर दस्तखत कर रही है जिससे मैक्सिको में लाखो लोगों की हत्या की जाएगी? क्या अमरीकी लोगों को पता था कि उनकी सरकार एक अपराधी का समर्थन कर रही है? वह आदमी तो चला गया। हम रह गए। हमारी मांगें पूरी नहीं की गई। हमारे हथियार इस बात को नई सरकार से, मैक्सिको की जनता से, दुनिया के सभी लोगों और सरकारों से कहते रहे, ‘हम यहां हैं।’

हम लोगों ने बड़े सब्र के साथ इंतज़ार किया कि नई सरकार हमारी ओर ध्यान दे और हमारी बातों को सुने।

मगर अमरीकी सत्ता के काले शासन में से किसी ने यह निर्णय लिया कि हम मेक्सिको के पूर्व-दक्षिण के आदिवासी विद्रोही अमरीका के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। उस काले शासन  से एक फरमान आया: खत्म करो इन सब को! उन्होंने हमारी भूरी चमड़ी, हमारी संस्कृति, हमारी भाषा की कीमत तय कर दी—यहां तक कि उन्होंने हमारे विद्रोह की भी कीमत लगा दी! अमरीकी सरकार ने एक बार फिर ऐसे आदमी का समर्थन करने का निर्णय लिया जो अपने पूर्ववर्ती शासकों द्वारा की गई छल-कपट की राजनीति को कायम रख रहा है। एक ऐसा आदमी जो मैक्सिको की जनता को लोकतंत्र, स्वतंत्रता और न्याय से वंचित करने पर तुला हुआ है। इस आदमी और उसकी सरकार को लाखों डॉलर लोन के रूप मे दिए गए। अमरीकी लोगों के समर्थन के बिना और उनसे पूछे बगैर इतिहास का सबसे बड़ा लोन मैक्सिकन सरकार को दे दिया गया। यह लोन लोगों के रहन-सहन में सुधार लाने के लिए नहीं था, यह लोन देश के राजनीतिक लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए नहीं था, न ही यह फैक्ट्री एवं अन्य उत्पादक परियोजनाओं के तहत देश की आर्थिक स्थिति को सक्रिय करने के लिए था। यह लोन दिया गया भ्रष्टाचार के लिए, सट्टेबाज़ी के लिए, स्वांग रचने के लिए और विरोधियों के समूह का विनाश करने के लिए। वे विरोधी, जो अधिकतर आदिवासी हैं—जिनके पास न तो ठीक हथियार हैं, न पोषण, न साधन, मगर वे  उन सब चीजों के बिना भी अत्यंत स्वाभिमानी हैं, विद्रोहात्मक हैं और इसके साथ ही सम्पूर्ण इंसान हैं।

छल को फाइनेन्स करने के लिए इतना पैसा सिर्फ डर के कारण ही दिया जा सकता है। मगर अमरीकी सरकार किस चीज़ से डर रही है? सच से? नॉर्थ अमेरिका के लोगों को मालूम न पड़ जाए कि उनका पैसा आधुनिक दुनिया की सबसे पुरानी तानाशाही को कायम रखने के लिए खर्च किया जा रहा है? नॉर्थ अमेरिका के लोगों को मालूम न पड़ जाए कि उनके टैक्स का पैसा मैक्सिको के आदिवासियों के दमन और कत्लेआम के लिए इस्तेमाल हो रहा है?

नॉर्थ अमेरिका के लोगों को किस चीज का डर है? क्या उन्हें हमारी लकड़ी की बंदूकों या फिर हमारे नंगे पैरों, थके-मांदे शरीरों, हमारी भाषा एवं संस्कृति से डरना चाहिए? क्या उन्हें हमारी चीखों से डर लगना चाहिए, जो लोकतंत्र, स्वतंत्रता और न्याय की गुहार लगा रही हैं? क्या अमरीका का जन्म इन तीन मूल्यों पर ही आधारित नहीं है? क्या लोकतंत्र, स्वतंत्रता और न्याय हर इंसान के हिस्से का अधिकार नहीं है?

इस बात को सही ठहराने के लिए कितने लाखों डॉलरों की जरूरत है कि दुनिया के किसी भी कोने में एक इंसान से उसकी स्वतंत्र सोच का अधिकार छीन लिया जाए, उसके बोलने और कार्रवाई करने की स्वतंत्रता को दबा दिया जाए, उसे अपनी योग्यता के हिसाब से लेन-देन करने की स्वतंत्रता से वंचित रखा जाए, या उसे अपने शासक चुनने और सामूहिक उद्देश्य बनाने एवं लागू करने के अधिकार न दिए जाएं?

बजाय इन चीजों से डरने के, क्या नॉर्थ अमेरिका के लोगों को पैसे, आधुनिक हथियार और ड्रग्स की तस्करी मे शामिल दमघोंटू टेक्नॉलजी से नहीं डरना चाहिए? क्या नॉर्थ अमेरिका के लोगों को ड्रग्स की तस्करी करने वालों और अपनी सरकारों के बीच मिलीभगत से डर नहीं लगना चाहिए? क्या उन्हें मैक्सिको में काबिज एकछत्र तानाशाही से नहीं डरना चाहिए? क्या उन्हें उस हिंसा से नहीं डरना चाहिए जो बेशक ही स्वतंत्रता, लोकतंत्र और न्याय के अभाव में पनपती है? अमरीकी सरकार, जो दशकों से दुनियाभर में लोकतंत्र का झण्डा फहराती आई है, आज क्यों तानाशाही की मुख्य समर्थक बनी हुई है? आज नहीं तो कल अमरीकी सरकार के समर्थन के बावजूद, लाखों डॉलर खर्चने के बावजूद, सैकड़ों झूठ फैलाने के बावजूद, जो तानाशाही मैक्सिको के आसमान में काले बादलों की तरह छाई हुई है उसका अंत जरूर होगा। मैक्सिको की जनता जरूर कोई तरीका ढूंढ निकालेगी, जिससे वह लोकतंत्र, स्वतंत्रता और न्याय के अपने ऐतिहासिक अधिकारों पर दावा कर सके

 

(इस लेख को एडिट करने में शहादत खान ने मदद की है)

सबकमानदांते मार्कोस
सबकमानदांते मार्कोस

सबकमानदांते मार्कोस या राफेल सेबेस्टियन गुइलेन विसेंट (1957-) मैक्सिकन विद्रोही, पूर्व सैन्य नेता और चियापास संघर्ष में नेशनल लिबरेशन (EZLN) की ज़ापतिस्ता आर्मी के प्रवक्ता के तौर पर जाने जाते हैं। इसके अलावा, उनकी ख्याति पूंजीवाद और नवउदारवाद विरोधी वैश्वीकरण के आइकन के तौर पर भी हैं। अपने... सबकमानदांते मार्कोस या राफेल सेबेस्टियन गुइलेन विसेंट (1957-) मैक्सिकन विद्रोही, पूर्व सैन्य नेता और चियापास संघर्ष में नेशनल लिबरेशन (EZLN) की ज़ापतिस्ता आर्मी के प्रवक्ता के तौर पर जाने जाते हैं। इसके अलावा, उनकी ख्याति पूंजीवाद और नवउदारवाद विरोधी वैश्वीकरण के आइकन के तौर पर भी हैं। अपने ट्रेडमार्क स्की मास्क, पाइप और करिश्माई व्यक्तित्व के लिए जाने जाने वाले मार्कोस ने 1994 के EZLN विद्रोह का समन्वय किया, बाद में होने वाली शांति वार्ताओं का नेतृत्व किया और अगले दशकों में ज़ापतिस्ता के संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाई। युद्धविराम के बाद ज़ापतिस्ता क्रांतिकारी गुरिल्ला युद्ध से एक सशस्त्र सामाजिक आंदोलन में परिवर्तित हो गए, जिसमें मार्कोस की भूमिका सैन्य रणनीतिकार से जनसंपर्क रणनीतिकार के रूप में परिवर्तित हो गई। मार्कोस एक विपुल लेखक भी हैं। उनकी साहित्यिक प्रतिभाओं को प्रमुख लेखकों और बुद्धिजीवियों द्वारा व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। उनके लेखन में संचार और नॉन फिक्शन की कई किताबें शामिल हैं।