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मृतकों की ख़ानत

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March 04, 2023

मृतकों की ख़ानत

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पटचित्र: मीर सुहैल 

अनुवादक: अक्षत जैन
स्त्रोत: Scribd

सेना द्वारा मारे या गायब किए गए अपने 16 कज़िन के नाम जब उसने गिनाने शुरू किए, तब राज मोहम्मद खान के चेहरे पर लगभग बनावटी मुस्कुराहट छा गई। उसकी नीली आंखें चमक उठीं, जैसे वह कुछ कहना चाह रहा हो, लेकिन कह नहीं पा रहा हो, “तुमको लगता है कि तुम एक दिन अपनी शहरी अकड़ में रिसे हुए, हाथ में रिकॉर्डर, कलम और नोटबुक के साथ ईद के चांद की तरह यहां आ टपकोगे, हमारी कहानियां सुनोगे, शाम को अपने आरामदायक घरों में नोट्स के पहाड़ के साथ लौटोगे, यहां से इकट्ठे किए नोट्स को मिलाकर लंबी कहानी बुनोगे और फिर ऐसा सोचोगे कि तुम्हें जरा-सा भी इल्म है कि हम पर क्या गुजरी है? भाई, तुम कुछ नहीं जानते।”

ऐसा भी हो सकता है कि उसकी मुस्कुराहट का यह मतलब न हो। यह उसका अपनी 23 साल की ज़िंदगी में सृनगर से 120 किलोमीटर उत्तर की ओर लोलाब में स्थित इलाके डाइवर में 180 जनाज़ों के साथ चलने और सबसे करीबी रिश्तेदारों के 20 ताबूत उठाने के भयानक बोझ को बर्दाश्त करने का तरीका भी हो सकता है। वह अपने 16 कज़िन और उनकी हत्याओं के बारे में जल्दबाजी में नहीं बताना चाहता था। वह यक़ीनन उन पर विस्तार से चर्चा भी करना चाहता था।              

“अहसान खान, सिविलियन, फौज द्वारा मारा गया”

“बशीर खान, सिविलियन, अपने घर के बाहर घसीटकर मारा गया”

“फारूक खान, सिविलियन, फौज द्वारा गायब किया गया”

“अज़ीज़ खान, सिविलियन, स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और फौज ने पहले हत्या की और फिर उसका चेहरा विकृत कर दिया”

“फरीद खान, सिविलियन, फौज द्वारा मार गया”

“मतिउल्लाह खान, सिविलियन, फौज द्वारा गायब किया गया”

“यासीन खान, सिविलियन, गायब”

“शरीफ खान, मिलिटेन्ट, अल बर्क (मिलिटेन्ट संगठन), राष्ट्रीय राइफल्स (हिन्दुस्तानी सेना का उग्रवाद रोधी बल) द्वारा मारा गया”

“शौकत खान, मिलिटेन्ट, अल बर्क, राष्ट्रीय राइफल्स द्वारा मारा गया”

“विलायत खान, मिलिटेन्ट, अल बर्क, राष्ट्रीय राइफल्स द्वारा मारा गया”

“शफ़ीज़ुल्लाह खान, मिलिटेन्ट, अल बर्क, राष्ट्रीय राइफल्स द्वारा मारा गया”

“ज़मन शाह, 17 साल की उम्र, अपनी अम्मी के साथ कहीं जा रहा था, जब ‘छाती पे सीधा फायर ठोका गया’, अपनी मां की गोद में दम तोड़ दिया”

“इकबाल खान, गायब, उसके फटे कपड़े जंगल से बरामद हुए”

“परवेज़ खान, सिविलियन, वह अपने कान के पास ट्रांजिस्टर रखकर पाकिस्तान और केन्या के बीच चल रहा क्रिकेट मैच सुन रहा था। उन्होंने उसकी गोली मारकर हत्या कर दी और बाद में कहा कि उन्हें लगा कि वह वायरलेस पर बात करता मिलिटेन्ट था”

“दिलावर खान, सिविलियन, हमारे परिवार को केवल उसका चार टुकड़ों में बंटा मृत शरीर मिला”

“सलाम दीन, सिविलियन, फौज द्वारा मारा गया, पहले उसे मिलिटेन्ट करार किया गया, फिर उसके भाई को एक लाख रुपये दिए गए और उसके भतीजे शाह ज़मन को नौकरी दी गई”

यहां मैंने उससे पूछा कि मुझे ज़रा विस्तार से बताओ कि सलाम दीन की मौत कैसे हुईहालांकि उनके मिट्टी और लकड़ी के बने घरों में, उनकी संपत्ति की तरह उनकी ज़िंदगी और मौत के बारे में भी कम ही जानकारी है।

राज मोहम्मद ने बताया कि “एक बार वे उसे टेकीपोरा ले गए थे। वहां उसे इतनी बुरी तरह से पीटा गया कि उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। उस पिटाई के बाद वह बदल गया और पागल की तरह इधर-उधर भटकने लगा। फिर उसके अंदर से डर खत्म हो गया, जो घातक साबित हुआ। उसने फौजी के ‘हैंड्स अप’ चिल्लाने पर हाथ ऊपर करना बंद कर दिया। फिर बस जो होना था वही हुआ

उसे अपने सारे मृत रिश्तेदारों के नाम याद नहीं आते, लेकिन उसके भाई-बहन और कुछ कज़िन (जो ज़ाहिर ही कहानी बताने के लिए अब तक ज़िंदा बचे हैं) उसकी मदद करने आगे आते हैं। फिर जब वे आश्वस्त हो जाते हैं कि उन्होंने सारे नाम ले लिए हैं, तभी एक पतला-दुबला आदमी कमरे के अंदर आता है।

वह आदमी राज मोहम्मद से पूछता है, “तुमने उन्हें मेरी बेटी के बारे में बताया, जो खेत में काम कर रही थी, जब फौज के फायर किए गए मोर्टार ने उसकी धज्जियां उड़ा दीं

“मैं आपको खातूनी के बारे में बताना भूल गया,” राज मोहम्मद मुझसे कहता है।

खातूनी राज मोहम्मद के कज़िन अनवर खान की पत्नी थी। पहले मुझे लगता है जिस मोर्टार की वह शिकार हुई, वह लाइन ऑफ कंट्रोल पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के फौजियों द्वारा एक-दूसरे पर चलाया गया मोर्टार होगा। लेकिन वे सब मुझ पर हंसते हैं।

“नहीं, उन दिनों वे लोगों में डर पैदा करने के लिए बेतरतीब मोर्टार चलाया करते थे। उन दिनों फौजी को देखकर ही घिन आती थी। कृपया करके उन दिनों के बारे में न पूछें,” राज मोहम्मद कहता है।

उसके परिवार को जम्मू और कश्मीर में सैनिक बलों द्वारा मारे गए कश्मीरी मुस्लिम सिविलियन के लिए सरकार द्वारा मानक मुआवज़ा दिया गया—पूरे एक लाख रुपये।

ाज मोहम्मद के पैदाइशी गांव कक्कर पट्टी की ख़ानत के स्थानीय निवासियों का कहना था कि कुछ खान, जो फौज के मुखबिर के तौर पर या उग्रवाद रोधी बल में काम कर रहे थे, उन्हें मिलिटेन्ट ने मार गिराया, लेकिन उन लोगों के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। उसी तरह से कोई मारे गए मिलिटेन्ट के बारे में भी बात नहीं करना चाहता। खानों के बीच सहमति थी कि दोनों मिलिटेन्ट और फौज के लिए काम करने वाले मुखबिरों ने अपने पाले चुन लिए थे, इसलिए जिस तरह से उनकी मौत हुई, वे उसके हकदार थे। लेकिन इन दोनों गुटों के लिए जनमानस में अलग तरह की भावनाएं हैं। हालांकि, जिन आम नागरिकों की हत्याएं हुई हैं, उनके बारे में लोग विस्तार से बात करना चाहते हैं।

हताहतों की और खासकर अपने कज़िन्स के नामों की लंबी लिस्ट की गिनती शुरू करने से पहले राज मोहम्मद ने अपने भाई अहमदुल्लाह खान और पिता हबिबुल्लाह खान की हत्याओं की कहानी सुनाई। 21 मई 1999 के दिन अहमदुल्लाह जलाऊ लकड़ियां इकट्ठी करने 20 मिनट पैदल चलकर पास के जंगल में गया। फौज की घात-टुकड़ी ने उसे गोलियों से मार गिराया। अगले दिन फौज के तीन गोरखा राइफल्स ने उसका शव एक स्थानीय मिलिटेन्ट के शव के साथ उसके परिवार को लौटाया। अहमदुल्लाह अपने पीछे अपनी पत्नी जमीला और उनके तीन, एक से चार साल की उम्र के बच्चे छोड़ गया। जमीला ने फिर से शादी कर ली और तीनों बच्चे दादा हबिबुल्लाह खान के पास रहने लगे। उनके परिवार को यह साबित करने में चार साल लगे कि अहमदुल्लाह सिविलियन था, जिसके बाद ही उन्हें उनके हक के एक लाख रुपये मिले। उसमें से कुछ पैसों से परिवार ने अपनी पहली गाय खरीदी।

अब हबिबुल्लाह खान आठ लोगों के पोषण के लिए जिम्मेदार था: खुद वह, उसकी पत्नी, उसके तीन बच्चे और उसके मारे गए बेटे के बच्चे। 70 साल की उम्र और बिगड़ती तबीयत के साथ उसके लिए यह करना बहुत तकलीफदेह साबित हुआ और उसने कुपवाड़ा मार्केट में भीख मांगना शुरू कर दिया। अप्रैल 2010 में जब वह तीन दिन तक घर नहीं लौटा तो राज मोहम्मद अपने पिता की तलाश में कुपवाड़ा मार्केट गया। मार्केट में लोगों के बीच भनभनाहट थी कि सेना ने किसी 70 साल के मिलिटेन्ट को मार गिराया है। राज मोहम्मद ने एक दुकानदार को अपने पिता की फोटो दिखाई।

“यही हैं,” उसे बताया गया।

राज मोहम्मद फिर संक्षिप्तता पर उतर आया। उसने कहा, “मैंने पुलिस पोस्ट जाकर चौकी अफसर को अपने पिता के बारे में बताया। उन्होंने तीन दिन पहले उन्हें दफन कर दिया था। अफसर ने मुझे उसके मोबाईल फोन पर एक तस्वीर दिखाई। हत्यारों ने अब्बा के कपड़े बदल दिए थेउनका फेरन, जूते, और उनके माथे पर वैसी कैप जैसी मिलिटेन्ट अक्सर पहना करते हैं।”

“पुलिस एसपी ने तीखे शब्दों में कहा ‘लोग तो मरते रहते हैं, फिर भी मैं मसले की तहकीकात करूंगा, चार दिन बाद आना।’ लेकिन हमारे एक प्रभावशाली रिश्तेदार ने कहा कि हम लोग जाकर विधायक हक साहब से बात करेंगे। फिर एसपी ने अपना सुर बदला और एक दिन बाद कहा कि उसने बांदीपोरा में एक बूढ़े व्यक्ति की मौत के बारे में सुना था। ज़ाहिर तौर पर यह उसकी हमको गुमराह करने की तरकीब थी।”

उसके एक दिन बाद हबिबुल्लाह खान के शव को उसके घर से 52 किलोमीटर दूर हंदवोर तहसील के मगाम गांव के पास पहल डाजी गांव में स्थित जंगल में बनी कब्र से खोदकर निकाला गया। उसके माथे और सीने पर गोलियां दागी गईं थी।

“एसएचओ ने हमसे कहा कि बात का बतंगड़ बनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार परिवार के एक सदस्य को नौकरी दे देगी। जब हम उसे उस वादे के बारे में याद दिलाने गए तो उसने कहा कि सरकार ने अब ऐसे मसलों में नौकरियां देना बंद कर दिया है। हम हक साहब के पास गए, उन्होंने भी कहा ‘कोई नौकरी नहीं’। बिलाल लोन (हुर्रियत के नेता) और महबूबा मुफ्ती ने आकर केवल हमारे साथ सहानुभूति जताई। सिर्फ इंजीनियर रशीद (विधायक) ने हमें पांच हजार रुपये दिए,” राज मोहम्मद ने बताया।

पुलिस ने सेना के खिलाफ मर्डर का केस दर्ज किया और मैजिस्ट्रैट ने केस की एक सुनवाई भी की। उसके बाद से सब चुप। ऐसा है कि मानो वह मुआवज़े के एक लाख रुपये, जिनको कश्मीरी ‘ब्लड मनी’ बोलते हैं, केस समाप्त करने के लिए दिए गए हों।

जिन भयानक परिस्थितियों का सामना कक्कर पट्टी के खानों को करना पड़ा है, उससे यह मिथक तो ध्वस्त होता है कि विद्रोह से निपटते वक्त राज्य समुदायों के बीच फर्क करता है। खान गुर्जर हैं और उनके बारे में उनके संदर्भ को पूरी तरह से नकारते हुए यह गलत धारणा बनाई गई कि वह राज्य के उतने खिलाफ नहीं है जितने कि उनके कश्मीरी हमकौम, जिन्होंने आज़ादी के लिए राज्य के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया है। सिर्फ कक्कर पट्टी से ही 23 गुर्जर सेना से लड़ते हुए मारे गए हैं।

वहीं के रहने वाले नागरिक अधिकार कार्यकर्ता अहसान उंटू बताते हैं कि पिछले 20 सालों में डाइवर में 200 से भी ज्यादा मारे गए लोगों में 170 सिविलियन थे। सेना या पुलिस के खूंखार एसओजी या दोनों द्वारा मारे गए बहुत से सिविलियन्स को पहले मिलिटेन्ट करार किया गया और फिर मौत के बाद उनके परिवारों को 1 लाख रुपये का नियमित मुआवज़ा देकर बरी कर दिया गया—ईद उल-अज़हा पर सृनगर में कुर्बानी के भेड़ की एक अनोखी नस्ल हाल ही में इससे दोगुनी रकम में बिकी थी।

कक्कर पट्टी और डाइवर के अन्य गांवों में की गई इन हत्याओं के बारे में सबसे मार्मिक बात लोगों द्वारा इनके आधिकारिक कथनों के प्रति मौन सहमति है, जहां दूसरी तरफ वे—दस, पंद्रह या बीस साल बाद भी—स्पष्ट तौर पर विस्तार से बताते हैं कि उनके प्रियजन असल में कैसे मारे गए। सरकार 1 लाख रुपये का मुआवज़ा सिर्फ तब ही देती है जब मृतक का परिवार आधिकारिक कथन को मानने के लिए राज़ी हो जाए, जिससे सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस को आरोप मुक्त किया जा सके। दुनिया में और कहीं भी लोगों की गरीबी का इस्तेमाल उनकी वफादारी को छोटी-सी रकम और मृतकों की स्मृति के प्रति निष्ठा के बीच विभाजित करने के लिए नहीं किया गया। सेना की तरफ सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) है, जो उन्हें ऐसी हत्याओं के दंड से बचाता है। खानों ने इस कानून की अन्य कानूनों के ऊपर सर्वोच्चता को अपने सहज-ज्ञान से स्वीकार कर लिया है।

दिलावर शाह के मामले को ही लीजिए, जो पांच बेटियों और एक बेटे का पिता था। अपने इलाके के लगभग हर बालिग मर्द की तरह 90 के दशक में उसे भी सेना ने मिलिटेन्ट का सहयोग करने के शक पर उठा लिया था। उसके भाई हुसैन शाह का कहना है कि सेना ने उसे हिरासत में टॉर्चर किया और इलेक्ट्रिक शॉक भी दिए। उसके हिसाब से वह 1998 या ’99 का साल था।

हुसैन बताते हैं, “टॉर्चर ने उसे पूरी तरह से तोड़ दिया। उसके बाद वह ठीक से चल भी नहीं पाता था और कुछ काम करने के लायक भी नहीं बचा था। उसकी मानसिक हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी और वह अपने बड़े परिवार का पेट भरने के लिए भीख मांगने लगा था।”

7 मई 2003 की रात को सेना ने दावा किया कि उन्होंने कक्कर पट्टी से 4 किलोमीटर दूर वानी दरूसा में बंदूकधारियों के साथ हुई मुठभेड़ में 2 मिलिटेन्ट को मार गिराया। अगले दिन हुसैन किसी काम के सिलसिले में राजस्व अधिकारी से मिलने दरूसा गया। उसने ‘मुठभेड़’ स्थल पर मांस के कुछ टुकड़ों और खून के धब्बों को देखा। उसको एक औरत ने बताया कि रात को सेना ने वहां धमाका किया था और बाद में उन्होंने दावा किया कि 2 मिलिटेन्ट मार गिराए। औरत ने उसे बताया कि शवों को दफनाने के लिए पास के गांव मैदानपोरा ले जाया गया है।

इस घटनाक्रम के बारे में हुसैन बताते हैं, “यह सुनकर मुझे चिंता होने लगी, क्योंकि दिलावर एक दिन पहले ही लापता हो गया था। मैं फटाफट कब्रिस्तान पहुंचा तो देखा कि इमाम ताबूत में रखे शव के लिए जनाज़े की दुआ पढ़ रहे हैं। मैंने उन्हें बताया कि मेरा भाई लापता हो गया है और मैं सुनिश्चित करना चाहता हूं कि यह शव उसका नहीं है। उन्होंने ताबूत खोला और कफन हटाया। मैंने चीखकर कहा कि यह तो मेरा भाई ही है।”

“लोगों ने मुझे बताया कि सेना ने उन्हें दफनाने के लिए यह कहकर दो बोरे दिए थे कि उनमें दो मिलिटेन्ट की लाशें हैं। पर उन्हें मालूम पड़ा कि असल में एक ही शव के दो टुकड़े करके उन्हें दो बोरों में भर दिया गया था। फिर वहां के लोकल्स ने दोनों हिस्सों को कफन में एक साथ रखा।”

शहीदों के जनाज़े का अन्य लोगों की तरह ग़ुस्ल नहीं किया जाता, जिसके करण वह मेहनत बच गई, जो दोनों हिस्सों को सीलने के लिए करनी पड़ती।

क़फन-दफन को एक बार के लिए रोक दिया गया। हुसैन शव को कब्रिस्तान में छोड़कर लालपोरा पुलिस थाने की ओर भागा। उसने पुलिसवालों को बताया कि सेना के किए दावे के विपरीत रात को उन्होंने दो मिलिटेन्ट को नहीं, बल्कि उसके भाई को मारा है, एक सिविलियन, जिसका शरीर अब दो भागों में कटा हुआ है। उसे सोगाम पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करने के लिए कहा गया, क्योंकि दरूसा उनके अधिकारक्षेत्र में नहीं पड़ता था। उसने अपनी और लोगों द्वारा बयान कहानी सोगाम पुलिस को बताई।

जब हुसैन शव को कक्कर पट्टी के सामुदायिक कब्रिस्तान में दफनाने के लिए ले जाने के इरादे से कब्रिस्तान लौटा तो सेना ने शव को ट्रान्सफर करने की अनुमति नहीं दी। मैदानपोरा के रहने वालों के विरोध प्रदर्शन के कारण सेना को अपने फैसले को वापस लेना पड़ा।

अपने घर पर हुसैन अपनी बेटी से टीन के डिब्बे से इस केस के दस्तावेज़ लाने को कहता है। वह मुझे एफआईआर दिखाता है, जिसे वह खुद नहीं पढ़ सकता। यह हत्या करने के प्रयत्न और हथियार रखने के लिए वानी दरूसा में “मुठभेड़ में मारे गए दो अज्ञात हथियारबंद आदमियों” के खिलाफ दर्ज की गई है। इसके मुताबिक, वहां कुछ और मिलिटेन्ट भी थे, जो फरार हो गए और एक सिविलियन की भी मौत हुई। वह सिविलियन दिलावर शाह था। AFSPA की जादुई शक्तियों के चालाक इस्तेमाल से एफआईआर दिलावर की हत्या को मुठभेड़ में गलती से हुई मौत का दर्जा दे देती हैऐसी मुठभेड़ जिसके बारे में वहां के निवासियों को एक धमाके के अलावा कुछ याद नहीं।

लोगों को ऐसा क्यों बताया गया कि बोरों में दो मिलिटेन्ट के शव थे? यह ‘अज्ञात’ मिलिटेन्ट कौन थे? मानसिक रोग से पीड़ित आदमी भरी रात में अपने घर से 4 किलोमीटर दूर ऐसे स्थान पर कैसे पहुंचा, जहां सेना को ‘दो मिलिटेन्ट’ को मारने के लिए बम का इस्तेमाल करना पड़ा? फिर यह भी ऐसे इलाके में जहां तक जाती सड़क शाम के वक्त सेना द्वारा स्टील के गेट से बंद कर दी जाती है।        

पास पड़े दस्तावेज़ों के ढेर से हुसैन एक और एफआईआर निकालता है। इसका संबंध उसकी पत्नी के पिछली शादी से हुए बेटे ज़मन शाह से है। उसके पिता मिलिटेन्ट यूसुफ शाह की मौत सेना से लड़ते-लड़ते उसकी खुद की मौत से पंद्रह दिन पहले हुई थी। वह यूसुफ के मिलिटेन्ट अतीत के लिए शर्मिंदा नहीं है। उसके स्वर और भाव-भंगिमा में एक तरह का दृढ़ साहस झलकता है, लेकिन एफआईआर पढ़कर सुनाए जाने पर वह गुस्से में बदल जाता है।

“यह झूठ है,” वह कहती है।

“उस दिन मैं और ज़मन मेरे कुछ रिश्तेदारों से मिलने बांदीपोरा में बुमसी गांव जा रहे थे (उनके घर से पैदल एक घंटे की दूरी पर)। जब हम किट्सन पहुंचे तो मैंने कुछ गोलियों के चलने की आवाज सुनी। फिर मुझे ज़मन नीचे गिरता हुआ दिखा। उसका सीना गोलियों से छलनी हो गया था। मैंने उसको अपनी गोद में लिया और मदद के लिए चीखने लगी। मैं बहुत देर तक चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन कोई नज़र नहीं आया। फिर 30–40 फौजियों का एक समूह आया और उसके शरीर को उठाकर ले गया। उन्होंने कहा कि उन्हें लगा वह मिलिटेन्ट है और उनसे गलती हो गई,” बानो ने बताया। उस वक्त ज़मन नौवीं कक्षा का छात्र था।

एफआईआर के मुताबिक: “रोसिकल के इलाके में घूमते गश्ती दल को किट्सन के पास वाले जंगल से गोलियों के चलने की आवाज़ सुनाई दी। संदिग्ध इलाके की तलाशी लेने पर अज्ञात नौजवान का गोलियों से छलनी हुआ शरीर बरामद हुआ (घाव सीने के बीच में थे)।”

ज़मन के परिवार को दिए गए एक लाख रुपये मिट्टी और लकड़ी के छोटे घर को बनाने पर खर्च दिए गए।

मैं राज मोहम्मद के घर से बाहर निकला। अब वह दो बच्चों का बाप है। उसकी मां नाज़िला खान, जिसको फौजी को देखकर ही घिन आती थी, अब अपने मृत बेटे अहमदुल्लाह के बनाए गए नए घर में आराम से बैठी है। हबिबुल्लाह मिट्टी की झोंपड़ी में रहता था

“अब किसी बात का डर नहीं है। उन्होंने काफी लोगों को मार गिराया। अब किसको मारेंगे?”

एक छोटे से टीले के ऊपर स्थित सीढ़ीदार कक्कर पट्टी गांव में जब मैं चलता हूं तो ऐसा लगता है कि छोटे लकड़ी के घर हल्के भूरे रंग के खंडित पेड़ों के घने जंगल के साथ घुल रहे हैं, जिसके करण पूरा गांव कुछ खाली-खाली-सा लगता है। लेकिन जल्द ही, बूढ़े और नौजवान पुरुष और महिलाएं अपने घरों से बाहर निकलते हैं, सबके हाथों में दस्तावेज़ हैं—ताजे, उखड़े हुए, फटे हुए, परत चढ़ाए हुए। एक आधिकारिक दस्तावेज़ है, जो प्रमाणित करता है कि फलाना मृत व्यक्ति सिविलियन था। एक और दस्तावेज़ है, आय प्रमाण पत्र, जो घोषित करता है कि मृतक का परिवार गरीबी रेखा से नीचे है, जिससे उनको सरकार की तरफ से मुआवज़ा या अन्य तरह की मदद मिल सके। वे सब चाहते हैं कि मैं उनकी भी कहानियां सुनूं। राज मौहम्मद मुस्कराता है, या फिर क्या यह वही बनावटी मुस्कुराहट है, जिसको मैंने पहले देखा था।

“मैंने आपको बताया था। इस गांव के लोगों की कहानियां लिखने में आपको अरसा लग जाएगा,” वह कहता है।

तब मुझे समझ आया कि पूरे वक्त उसकी मुस्कुराहट बनावटी ही थी।

(लुबना और मुदासिर के साथ)  

                         

 

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हिलाल मीर
हिलाल मीर

लेखक

सृनगर, कश्मीर के रहने वाले हिलाल मीर स्वतंत्र पत्रकार (Freelance Reporter) के तौर पर काम करते हैं। उन्होंने अपने अभी तक के पत्रकारिता करियर में 'ग्रेटर कश्मीर', 'कश्मीर रीडर' और 'हिंदुस्तान टाइम्स' के साथ काम किया है। इसके अलावा, उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी के लिए भी रिपोर्टिंग की है। इन...

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