लंगड़ा सोफा

एक दिन मुझ पर स्पष्ट हुआ कि मैं उड़ सकता हूं। मेरे पर नहीं हैं मगर मैं हवा में तैर सकता हूं। एक रोज़ दोपहर से ज़रा पहले मुझे एक सिपाही ने रोका। उस सिपाही की ज़िम्मेदारी थी कि वह बाज़ारों में फिरने वाले मोटे लड़कों को शर्मिंदा करे। मैं मोटा था और मुझे मोटापे पर क़ाबू पाने के लिए बहुत-सी तर्तीब दी गई थीं। पुलिस के कारिंदे पूरे शहर की गलियों में खुंबियों की तरह पाए जाते थे।

लंगड़ा सोफा
फ़ायरफ़्लाई फ़ॉर आर एलिजाबेथ सुलिवन द्वारा डिजिटल कलाकृति का एक टुकड़ा है जिसे 27 मार्च 2012 को अपलोड किया गया था

अनुवाद: मुहम्मद फ़ैसल

 

एक दिन मुझ पर स्पष्ट हुआ कि मैं उड़ सकता हूं। मेरे पर नहीं हैं मगर मैं हवा में तैर सकता हूं। एक रोज़ दोपहर से ज़रा पहले मुझे एक सिपाही ने रोका। उस सिपाही की ज़िम्मेदारी थी कि वह बाज़ारों में फिरने वाले मोटे लड़कों को शर्मिंदा करे। मैं मोटा था और मुझे मोटापे पर क़ाबू पाने के लिए बहुत-सी तर्तीब दी गई थीं। पुलिस के कारिंदे पूरे शहर की गलियों में खुंबियों की तरह पाए जाते थे। मैंने बचने की कोशिश की मगर बेसूद। उस सिपाही ने मेरा बाज़ू पकड़ा और उसे कमर के पीछे करके मरोड़ने लगा। मैंने उसकी मिन्नत की कि वह मुझे छोड़ दे और अपने वालिद मरहूम की क़सम खाकर उसे यक़ीन दिलाया कि मैं उस वक़्त तक घर से बाहर क़दम नहीं निकालूंगा, जब तक में अपना वज़न 20 पौंड न घटा लूं। उसने मेरे वालिद की शान में गुस्ताख़ी की और मुझे छोड़ दिया। अपने मरहूम वालिद की बेइज़्ज़ती पर मुझे शदीद ग़ुस्सा आया मगर कमर पर पड़ने वाली उसकी छड़ी के ख़ौफ़ से ग़ुस्से पर क़ाबू पा लिया।

मैं घर गया और एक प्लेट भरकर चावल खाए। चावलों में तला हुआ आधा मुर्ग़, चंद बादाम, मटर और किशमिश शामिल थी। फिर मैंने कनाफ़े (मिठाई) के बड़े से टुकड़े से अपना मुंह मीठा किया और उसके बाद काली चाय का एक कप पिया। इन सबसे फ़ारिग़ होने के बाद मैंने एयर कूलर चलाया और अपने सहन में पड़े सोफ़े पर लेट गया। उस सोफ़े को सभी ‘लंगड़ा सोफा’ कहते थे, क्योंकि उसकी सिर्फ तीन टांगें थीं, और ये टांग बढ़ई के बस से भी बाहर हो गई तो उसकी कमी एक अदद ईंट से पूरी कर दी गई। ईंट के टूटने की वजह मेरी सोफ़े पर लेटने की आदत थी।

अचानक मुझे दरवाज़े पर ज़ोरदार दस्तक और बाहर से शदीद शोर की आवाज़ सुनाई दी। मैं हड़बड़ाकर देखने के लिए उठा कि बाहर क्या हो रहा है। यह वही पुलिस वाला था, जो इस बार मेरी मां को बुरा-भला कहे जा रहा था, क्योंकि उसने कूड़े से उस शानदार मुर्ग़ के पर बरामद किए थे, जो उसने मेरे लिए भूना था। मैंने जैसे ही सिर बाहर निकाला, पुलिस वाले ने मुझे पकड़ने की कोशिश की, मगर मैं उसे गच्चा देने में कामयाब हो गया और किसी माहिर बाज़ीगर की तरह उसकी छड़ी छीनी और रफूचक्कर हो गया। अपने मोटापे के बावजूद मैं किसी ऐसे हिरन की तरह दौड़ रहा था, जो भूखे चीते से अपनी जान बचाने के दर पर हो। पुलिस वाले ने मुझ पर यह चीख़ते हुए गोलियां चलाई कि, “तुम एक जानवर हो, जानवर, रुक जाओ!”

सिर्फ मोटापा कंट्रोल वाले नहीं बल्कि क़स्बे में हर शख़्स ने मेरे वज़न की बदौलत मेरे इन्सान होने पर शक का इज़हार किया था। उन्होंने मुझे इतनी बार जानवर कहा कि मुझे यक़ीन हो चला था कि मैं जानवर हूं।

मैंने पुलिस वाले की धमकियों की परवाह न करते हुए, बारिश की तरह बरसती गोलियों में दौड़ जारी रखी। एक गोली तो कान के इस क़दर क़रीब से गुज़री कि मुझे लगा कि मेरा कान तो गया, मगर मैं बच गया और हैरान हुआ कि मैं कैसे बच गया। शायद आज का दिन मेरे लिए ख़ुश-क़िस्मत था। ख़ैर, मैंने गोलियों से बचने के लिए दाएं-बाएं दौड़ जारी रखी और फिर मैंने एक छलांग लगा दी। ये एक बड़ी छलांग थी, बहुत बड़ी छलांग कि मुझे ख़ुद यक़ीन नहीं आ रहा था, और मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे मैं हवा में उड़ रहा हूं। नहीं नहीं! मैं हक़ीक़तन उड़ रहा था, मैं इतना ऊंचा उड़ा कि गोलियों के दायरे से बाहर आ गया और बिल-आख़िर गोलियां चलनी बंद हो गईं। पास से गुज़रते एक कव्वे ने सवाल किया कि मैंने पुलिस वाले का क्या किया है।

“तुम्हें इससे क्या? दफ़ा हो जाओ,” मैंने उससे कहा।

“अच्छा बहुत तेज़ बन रहे हो, अभी तुम्हें बताता हूं,” कव्वा ग़ुस्से से बोला।

मैंने कव्वे की धमकी को कोई भाव न दिया। यह काबिल-ए-नफ़रीं परिंदा, अक्सर हमारे घर की छत से सूखी मछलियां चुराता था। अम्मा उन्हें सूखने के लिए छत से लटकाती थीं, ताकि उन्हें लंबे अर्से तक इस्तेमाल किया जा सके। सर्दियों में वह उन्हें नमक मिले पानी में उबालकर हमें सूप पिलाती थीं। मैं और ज्यादा बुलंदी पर गया। मैं हवा को छड़ी से चीर रहा था, पुलिस वाले की छड़ी, जो अभी तक मेरे हाथ में थी, उसके हवा से टकराने से साएं साएं की आवाज़ें आ रही थीं। मैं दिल ही दिल में ख़ुश हो रहा था कि पास से गुज़रते एक चिड़िया ने कहा,

“इतनी ऊंचाई पर ध्यान से उड़ना, सातई।”

मैं नहीं जानता कि उसे मेरा नाम कैसे पता था, मगर उसकी इस बात से मेरा ध्यान अपने पीछे बनने वाले आग के गोले पर चला गया। लकड़ी हवा से टकराने की वजह से हवा में आग लग चुकी थी। मैंने फौरन ऐसा करना बंद कर दिया। मैंने छड़ी बुलंद की और आग के गोले की तरफ़ ऐसे लहराई, जैसे संगीतक़ार अपने दर्शकों की तरफ़ देखकर लहराता है। मैंने नीचे की तरफ़ इशारा किया तो आग का गोला तेज़ी से किसी शहाब साक़िब की तरह पुलिस वाले के सिर पर जा गिरा और उसे भुनी हुई किशमिश में तबदील कर दिया। मैंने लकड़ी से हवा को चीरना शुरू किया तो आग का गोला दोबारा बनने लगा। मैंने हवा में चक्कर लगाना शुरू किए। यहां तक कि आग का गोला बहुत बड़ा हो गया। मैंने उस क़स्बे के बाज़ार की तरफ़ जाने का इशारा किया। यह किसी आसमानी पत्थर की तरह नीचे गिरा और बाज़ार में मौजूद हर चीज़ और शख़्स को जलाने लगा। मुझे अजीब-सी ख़ुशी का एहसास हुआ। मैं उन सब के सिरों पर आग बरसाने लगा, जिन्होंने मुझसे मेरी इन्सानियत छीन ली थी, उस वक्त वे सब पनाह की तलाश में भागते चूहे लग रहे थे।

मैंने एक को कहते सुना, “ये ख़ुदा का अज़ाब है, ख़ुदा का अज़ाब।”

एक और चीख़ा, “पनाह! क़यामत की घड़ी आ चुकी है।”

और जब आग ने औरतों के हिजाबों को जला दिया तो उन्होंने दुहाई दी, “ओह हम बर्बाद हो गए।”

और मैं उन सब के सिरों पर क़हक़हे लगाता पूरे ज़ोर से चिल्ला रहा था, “जानवर।”

और ऐन उस मौक़े पर वो काबिल-ए-नफ़रीं कव्वा मेरी ओर बढ़ा और मेरे हाथ से छड़ी छीन ली। मैं लंगड़े सोफ़े पर गिरा और मेरी आंख खुल गई।

 

 

 

अज़हर जर्जीस
अज़हर जर्जीस

सुप्रिसद्ध इराकी लेखक अज़हर जर्जीस (AZHER JERJIS) का जन्म 1973 में बग़दाद में हुआ था। इन दिनों वह नॉर्वे में रहते हैं। उनकी कहानियों और लेखों के बहुत से संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनके नॉवेल Sleeping in the Cherry Field को अरब फिक्शन के इंटरनेशनल अवॉर्ड के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया चुका है। सुप्रिसद्ध इराकी लेखक अज़हर जर्जीस (AZHER JERJIS) का जन्म 1973 में बग़दाद में हुआ था। इन दिनों वह नॉर्वे में रहते हैं। उनकी कहानियों और लेखों के बहुत से संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनके नॉवेल Sleeping in the Cherry Field को अरब फिक्शन के इंटरनेशनल अवॉर्ड के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया चुका है।