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वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर

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May 24, 2026

वक़्त हमारे साथ नहीं है : औक़ात और कश्मीर
पटचित्र: मीर सुहैल 

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2016 में जब कश्मीर में जन आंदोलन चरम पर था, तब मेरी एक बूढ़े कश्मीरी से बातचीत हुई थी। वो मुझे आज भी याद है। कश्मीर की राजनीतिक हलचल का अपना आँखों-देखा ब्योरा देने के बाद, उन्होंने अपनी बात समेटते हुए कहा, “वक़्त चुन्ने ऐसे साथ दीवान,” एक कश्मीरी कहावत जिसका शाब्दिक अर्थ है : वक़्त हमारे साथ नहीं है। मुझे उनकी ये बात बहुत दिलचस्प लगी। किसी राष्ट्र और उसकी जनता की तक़दीर में वक़्त की आख़िर क्या अहमियत है?

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“ये कश्मीर की अवाम को एक बार फिर याद दिलाता है कि पूरे भारत तक ये सरल तथ्य पहुँचाना नामुमकिन है की भारत ने कश्मीर पर क़ब्ज़ा कर रखा है और इस क़ब्ज़े का कोई नैतिक बचाव नहीं किया जा सकता,” मनु जोसेफ, एक भारतीय लेखक, लिखते हैं। दूसरे शब्दों में वह भी वही बात कर रहे हैं, “वक़्त हमारे यानी हिंदुस्तान के साथ है।”

ये दो उदाहरण अनोखे नहीं हैं। अगर हम इनका विस्तार करें, तो हमें भारत और कश्मीर के संबंध की एक पूरी कहानी मिलेगी जो इसी विषय पर आधारित है। एक तरह का टॉक्सिक विवाह जो बिना रज़ामंदी के कर दिया गया, बिलकुल इसी कारण की दोनों जगह वक़्त के इतिहास में अलग-अलग स्थिति पर थीं। समय पर नियंत्रण भारत का था, और इसीलिए कश्मीर की तक़दीर पर भी। कश्मीर के भविष्य पर भारत का ये नियंत्रण कश्मीरियों को उनकी जगह, यानी उनकी औक़ात दिखाता है। 

औक़ात मूल अरबी का शब्द है; उसकी जड़ें ‘वक़्त’ शब्द में है। अरबी संस्कृति में, किसी व्यक्ति, समुदाय या राष्ट्र की हैसियत इस चीज़ से तय की जाती है कि उसका वक़्त कैसा चल रहा है। अरबी साहित्य और कथाओं में, किसी पात्र का उत्थान और पतन, यानी उसकी हैसियत या उसकी औक़ात वक़्त से तय होती है। वक़्त पर नियंत्रण ही किसी एक व्यक्ति को दूसरों की ज़िंदगी बदलने की शक्ति देता है, जिससे उनकी औक़ात दिखाई जाती है। उदाहरण के लिए, अरेबियन नाइट्स में, शहज़ादा अपनी शक्ति का इस्तेमाल कथावाचक पर करता है। मृत्यु से ख़ुद को बचाने के लिए, रखैल को वक़्त के ख़िलाफ़ दौड़ लगानी होती है, जिससे शहज़ादा उसको उसकी औक़ात दिखाता है। 

शहज़ादे की तरह, हिंदुस्तान भी कश्मीरियों को उनकी औक़ात दिखाता है, सबसे पहले उनसे ख़ुद की कथा बयान करने के हक़ को छीन कर। जैसे हिन्दुस्तान कश्मीर से कह रहा हो कि तुम्हारी औक़ात यही है कि तुम अपनी कहानी भी ख़ुद ना बता सको; या फिर क्योंकि तुम्हारी कोई औक़ात ही नहीं है, तो तुम्हारी ख़ुद की कोई कहानी भी नहीं हो सकती। जैसा कि हम जानते हैं, ख़ुद की कहानी बयान करना ख़ुद की ज़िंदगी को नियंत्रण में लेने के बराबर है, जो आत्मसम्मान और आज़ादी का इकलौता रास्ता है। 

मेरे यह कहने का क्या मतलब है? 

चलिए सबसे पहले देखते हैं कि भारत कश्मीर की कहानी कैसे बयान करता है। 

शुरुआत में एक घाटी थी, चारों तरफ़ ऊँचे पहाड़ों से घिरी हुई। वह घाटी पानी से भरी हुई थी और उसमें जल-दानव (कश्मीरी) रहते थे, जो साँपों की पूजा करते थे, अजीब-सी भाषा बोलते थे, गड्ढों में जीते थे और इंसानी मांस खाते थे। फिर वहाँ एक ऐसी क़ौम पहुँची जिसे रथ चलाना पसंद था, जो शराब पीती थी, वैदिक मंत्र गाती थी, अग्नि की पूजा करती थी, और जिसकी सामाजिक व आर्थिक ज़िंदगी संगठित थी। उनके साथ एक आध्यात्मिक पुरुष भी था, कश्यप ऋषि। स्थानीय नाग-पूजकों और उनके कीचड़ भरे पानी की दयनीय हालत देखकर ऋषि ने घाटी का सारा गंदा पानी बाहर निकाल दिया और उस धरती को शुद्ध किया। उसी ने घाटी का नाम रखा, कश्मीर। इसके बाद वह ज़मीन खिल उठी और सारी अशुद्धियाँ मिट गईं। नये बसने वालों ने वहाँ क़ानून, व्यवस्था और सभ्यता लाई, और उसे स्वर्ग में बदल दिया। बेशक, यह उत्पत्ति-कथा आगे चलकर उन दो समुदायों—कश्मीरियों और मैदानों से आए लोगों—के बीच रिश्तों की बुनियाद तय करती है, जो बाद में कश्मीर और भारत के रिश्तों में बदल जाती है। अगर हम इस उत्पत्ति-कथा से बहुत दूर निकलकर आधुनिक दुनिया में पहुँचें, तो दुनिया की शक्ल भले बदल गई हो, रिश्ता अब भी वही है; औक़ात का समीकरण अब भी कायम है।

1947 में उपमहाद्वीप का बंटवारा दो राष्ट्रों में कर दिया गया, भारत और पाकिस्तान। स्वतंत्र रियासत होने की हैसियत से कश्मीर को अपनी तक़दीर का फ़ैसला ख़ुद करना था। जब कश्मीरी अपने आत्मनिर्णय के अधिकार को इस्तेमाल करने के लिए तैयारी कर रहे थे और ख़ुद का महिमामंडन कर रहे थे (उन्हें ऐसा लग रहा था कि आख़िरकार उन्होंने ग़ुलामी से छुटकारा पा लिया है), मैदान के लोग वापस आये : इस बार आसमान से, हवाईजहाज़ों पर सवार, बन्दूकों से लेस, और सदियों पुराने नज़रिए के साथ की वे कश्मीरियों को उनकी औक़ात दिखाने के सभ्यतागत मिशन पर आये हैं। जल-दानवों ने ये सोचने की हिम्मत कैसे कर ली की वे अपनी तक़दीर का फ़ैसला ख़ुद करेंगे? 

कश्मीरी अपनी राजनीतिक एजेंसी की अभिव्यक्ति करते हुए (Getty Images)

हमें फ़्रांत्स फैनन पढ़ कर पता है कि व्यक्तिगत एजेंसी की अभिव्यक्ति, यानी समुदाय की शासन-विधि को चुनना मूल तौर पर मानवता की बराबरी और बंधुत्व की अभिव्यक्ति करना है। इससे समुदाय की गरिमा और उसके कार्य करने की शक्ति पुनर्स्थापित होती है। अपनी किताब ‘धरती के अभागे लोग’ में फैनन विरोध की प्रकृति को मीठे शब्दों में बयान करने से दूरी बनाते हैं और अधीन लोगों को आह्वान देते हैं कि राज्य को हिंसक तौर-तरीक़ों से उखाड़ फेंकें। इस तरह वह हिंसा की प्रकृति और उसको समझने के तरीक़ों को चर्चा में लाते हैं। “उपनिवेशवाद को मिटाना मूल तौर पर हिंसक घटना है,” वह लिखते हैं। ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ में मार्क्स के शुरुआती वाक्य की तरह वह भी हिंसा की ऐतिहासिकता का विश्लेषण करते हैं। फैनन यह तर्क रखते हैं कि अधीन लोगों द्वारा उत्पीड़क की ओर लक्षित हिंसा ना सिर्फ़ नैतिक है, लेकिन उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण तौर पर उनकी एजेंसी और इच्छाशक्ति की अभिव्यक्ति है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसा कार्य है जिससे वे अपने अमानवीयकरण से लड़ सकते हैं और अपनी औक़ात को पुनर्स्थापित कर सकते हैं।यह हिंसा इन लोगों को दुनिया में अपनी जगह देती है। 

1947 के बाद कश्मीरियों ने अपनी छीनी गई आज़ादी को पुनर्स्थापित करने की कोशिश की। उन्होंने राजनीतिक संगठन बनाये और भारत को बताना शुरू किया कि कश्मीरी उसके क़ब्ज़े से छुटकारा पाना चाहते हैं : भारत ने इसका जवाब हिंसा से दिया, जो की लोगों को उनकी जगह दिखाने के लिए ज़रूरी प्रक्रिया है। सैंकड़ों लोगों को जेलों में बंद किया गया, टार्चर किया गया और मार दिया गया। यह करते वक़्त भारत को अपने पक्ष में एक कहानी बनाने की ज़रूरत महसूस हुई, और उसने बिलकुल ऐसा ही किया। एक पुरानी कहानी जो सवर्ण राज्य अवर्ण जानता को दबाने के लिए इस्तेमाल करता आया था। कश्मीरियों की जाति और राजनीतिक संकल्प को मिला दिया जाता है, इसीलिए औक़ात को जातिगत रूप में समझना ज़रूरी है। वे बोलते हैं, “कश्मीरियों के पास स्व-इच्छा नहीं हो सकती।” “पाकिस्तान उन्हें भड़काता है।” इस तरह दो लक्ष्य हासिल होते हैं। पहले तो कश्मीरियों को मानव पदानुक्रम में सबसे नीचे रखा जाता है (उनके पास स्व-इच्छा ही नहीं है) – यहाँ आप जाति का काम देख सकते हैं – और उनके ख़िलाफ़ हिंसा को सही ठहराया जाता है। आख़िरकार, कश्मीरी तो म्लेच्छ लोग हैं जो सबसे नीच हैं और जिनके पास राजनीतिक हक़ हो ही नहीं सकते। साथ में, भारत ख़ुद से कश्मीरियों की तक़दीर का फ़ैसला करने को भी सही ठहराता है, क्योंकि कश्मीर उसके भौगोलिक हिस्से का अविभाज्य हिस्सा है। 

सृनगर में विरोध का दृश्य

कश्मीरियों को उनकी औक़ात दिखाने के भारत के मुख्य तरीक़ों में एक है कश्मीरी शरीर की एजेंसी छीनना – उसे बिना किसी हक़ के छोड़ देना, कश्मीरी शरीर के साथ महज़ एक वस्तु की तरह व्यवहार करना; ऐसी वस्तु जिसके ऊपर भारतीय राज्य ख़ुद की शक्ति का पारदर्शन श्रेष्ठ नस्ल या पूर्ण प्रभुत्व के रूप में कर सके। कश्मीरी शरीर बलिदान करने योग्य है। मानव-विज्ञान संबंधी सबसे क़रीब शब्द मेरे ध्यान में ‘होमो साकर’ है – और अगर हम भारतीय शरीर के कश्मीरी शरीर के साथ ऐतिहासिक संबंध को देखें, तो हमें इस द्विधाकरण के सैंकड़ों उदाहरण मिल जाएँगे। उस व्यक्ति को होमो साकर कहा जाता है जिसके पास कोई हक़ नहीं होते। जब अफ़ज़ल गुरु, एक कश्मीरी, को फाँसी की सज़ा दी गई थी, तब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि गुरु के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं हैं, लेकिन उसको फाँसी राष्ट्र की अंतरात्मा की शांति के लिए दी जा रही है। ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है। ये मालिक-ग़ुलाम के रिश्ते की प्रतिनिधि है – भगवानों की तृप्ति के लिए ग़ुलामों की बलि चढ़ाने की प्रथा – इस मामले में भारतीय राष्ट्रवाद की तृप्ति के लिए कश्मीरी की बलि चढ़ाई गई और कश्मीरियों को उनकी औक़ात दिखायी गई। 

होमो साकर; सोपोर हत्याकांड के बाद के दृश्य

कश्मीरियों को उनकी जगह दिखाने का भारतीय राज्य द्वारा अपनाया गया इसी तरह का एक और तरीक़ा है बलात्कार। प्रणालीगत बलात्कार, ना सिर्फ़ औरतों का, बल्कि पूरे जन समुदाय का। सैकड़ों कश्मीरी औरतों का बलात्कार भारतीय सेना और अर्ध-सैनिक बलों द्वारा किया जा चुका है। भारतीय राज्य कश्मीरियों की मर्दानगी और जन समुदाय की गरिमा को ठोकर पहुँचाने के लिए पारंपरिक तरीक़ों का इस्तेमाल करते हुए औरतों के शरीरों पर हिंसा करता है। कुनन और पोष्पोरा के गाँवों में जब साठ से भी अधिक औरतों का बलात्कार किया गया था, तो वह भारतीय राज्य का कश्मीरियों को ये बताने का तरीक़ा था कि देखो हम बिना किसी डर के कितनी भी कश्मीरी औरतों का बलात्कार कर सकते हैं। इस विशेष हादसे में, पहले भारतीय राज्य ने इल्ज़ामों को ठुकराया (हमारे मर्द बलात्कार नहीं कर सकते, ये औरतें झूठ बोल रही हैं, राज्य उन पर विश्वास नहीं कर सकता, उनकी औक़ात ही नहीं है भरोसे लायक़)। बाद में, भारतीय राज्य ने इसी हादसे का इस्तेमाल कश्मीर के औरतों और मर्दों के हक़ छीनने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए किया। उन्होंने ये तो मौन रूप से मान लिया कि हादसा हुआ था लेकिन न्याय की प्रक्रिया को इतना घसीटा गया मानो ये दिखाया जा रहा हो कि अगर तुम हमारी बात नहीं मानोगे तो इस तरीक़े के हादसे बढ़ते जाएँगे। 

कुनन और पोष्पोरा सामूहिक बलात्कार के पीड़ित

यहाँ सवाल कश्मीरियों की मूल गरिमा का है और इसलिए उनकी औक़ात का। ऐतिहासिक तौर पर, क़ब्ज़ा किए गए इलाक़ों में यौन हिंसा का इस्तेमाल समुदाय को नीचा दिखाने और उन्हें उनकी जगह याद दिलाने के लिए एक हथियार के रूप में किया जाता है। भारतीय क़ब्ज़ाधारी उपकरण इसमें जातिवादी और सामंती रवैये यानी अपनी पहचान के मूल को भी मिला देता है। इससे कश्मीरियों के एवज़ भारत की औक़ात का मामला निपटाया जाता है। कश्मीर के सशस्त्र आंदोलन को शक्तिहीन बनाने के लिए भारत जैसे राज्य इस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं। क्योंकि कश्मीरियों ने बंदूक़ उठायी थी, इसलिए भारत को उन्हें नीचा दिखाना था और उन्हें उनकी औक़ात याद दिलानी थी। 

भारतीय राज्य ने कश्मीर में कई क़ानून बनाये हैं जो कश्मीरियों को एक ही चीज़ कहते हैं; किसी भी कश्मीरी को किसी भी वक़्त पकड़ा जा सकता है, उसकी आज़ादी छीनी जा सकती है और उसे बिना मुक़दमे के कितने भी साल जेल में क़ैद रखा जा सकता है। पीएसए और अफ़स्पा सैद्धांतिक तौर पर ऐसे क़ानून हैं जिनका जन्म ही औक़ात की अवधारणा से होता है। वे क़ानूनी तौर पर कहते हैं कि कश्मीरियों की कोई हैसियत नहीं; वे वांछित मनुष्य नहीं। अगर किसी क्षेत्र के लोगों को अवांछित करार दे दिया जाये, तब उसकी ज़मीन के साथ भी उसी तरह का व्यवहार किया जाता है। ज़मीन से मेरा मतलब है उसके संसाधन, उन्हें बेरहमी से लूटा जाता है। पिछले कुछ दशकों में, भारतीय राज्य ने कश्मीरी सरज़मीं का हुलिया ही बदल डाला है। वह प्रकृति और वक़्त के साथ दख़लंदाज़ी कर रहा है और इस तरह कश्मीर के लोगों को और वहाँ की सरज़मीं को उसकी औक़ात दिखा रहा है।   

 

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नईम राथर
नईम राथर

लेखक

नईम राथर फ्रीलान्स कश्मीरी जर्नलिस्ट हैं। वह कहानीकार बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। वह मोबी डिक और ऑस्टेर्लित्ज़ के प्रशंसक हैं।

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अक्षत जैन
संपादक

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