कश्मीर: एक ऐतिहासिक कालक्रम (भाग 3: 1990-2020)

आत्म-निर्णय का अधिकार पाने के लिए कश्मीर में किए जा रहे आंदोलन की बुनियाद को सुदृढ़ करने वाली मुख्य राजनीतिक घटनाओं का वृतांत। यह पहला भाग है जिस में हम भारत के कब्ज़े के पहले का इतिहास बता रहे हैं। दूसरे भाग में भारत के कब्ज़े के बाद का इतिहास बताया जाएगा।

कश्मीर: एक ऐतिहासिक कालक्रम (भाग 3: 1990-2020)

Crop from a map by J.G. Bartholomew, titled “North-West Frontier Provinence and Kashmir,” from the Imperial Gazetteer of India, 1907-1909.

अनुवादक: अक्षत जैन
स्त्रोत: आदी मैगजीन

1947 में कश्मीर ‘अंतर्राष्ट्रीय विवाद’ के रूप में उभरा, लेकिन कश्मीर के सवाल को केवल उस चश्मे से देखने का मतलब है कश्मीर के अपने खुद के विशिष्ट राजनीतिक इतिहास को मिटाकर भारत-पाकिस्तान के राज्य-केंद्रित दृष्टिकोणों को विशेषाधिकार देना। आत्म-निर्णय के लिए कश्मीरियों की आकांक्षा को समझने की शुरुआत करने के लिए उन सब मुख्य घटनाओं को जानना और समझना जरूरी है जिन्होंने कश्मीरियों की राजनीतिक आत्म-चेतन को आकार दिया। कश्मीर का राजनीतिक इतिहास बाहरी शक्तियों और आंतरिक संघर्षों के बीच परस्पर जटिल और अस्थिर क्रिया से बना है। इस बात को ध्यान में रखते हुए मैं यह कालक्रम उन लोगों के लिए विस्तृत रूप से प्रस्तुत कर रहा हूं, जो यह जानना चाहते हैं कि कश्मीरियों द्वारा आत्म-निर्णय का अधिकार पाने के लिए किया जा रहा आंदोलन इतने दुर्लभ हालातों का सामना करते हुए भी अपने आप को बरकरार कैसे रख पा रहा है। एक बात स्पष्ट है, यह कालक्रम कश्मीर का इतिहास नहीं है, यह सिर्फ मुख्य राजनीतिक घटनाओं का वृतांत है। इस प्रकार, यह कालक्रम कश्मीरी वृतांत लेखन की लंबी परंपरा का हिस्सा है। मैंने सन् 1586 से इसकी शुरुआत इसलिए की है, क्योंकि बहुत से कश्मीरी मुग़ल आगमन को दक्षिण एशिया के साथ अपने पहले दुखद टकराव के रूप में देखते हैं।

(पहले भाग में हमने 1586 से 1947 तक का इतिहास बताया था। दूसरे भाग में 1947 से 1989 तक का और इस भाग में हम 1990 से 2020 तक का इतिहास बता रहे हैं।) 

1990

भारतीय सशस्त्र बलों ने जनवरी के दौरान कश्मीर में कई हत्याकांड किए। इसके जवाब में विरोध और तीव्र हो गया और हज़ारों कश्मीरियों ने भारत समर्थक पार्टियों से खुले तौर पर इस्तीफा दे दिया। एमयूएफ के चार चुने गए विधायकों ने भी विधानसभा छोड़ दी। 17 जनवरी को भारत ने फारूक अब्दुल्लाह की सरकार बर्खास्त कर केन्द्रीय शासन लागू कर दिया। हिंदू राष्ट्रवादी नौकरशाह जगमोहन को राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्होंने कश्मीरियों को धमकाते हुए यह दावा किया कि, “कश्मीर बीमार है और मैं उसका उपचार करने के लिए भेजा गया नौकर हूं।” जगमोहन ने व्यापक तौर से शहरी मोहल्लों के ऊपर तेजी से सैन्य क्रैकडाउन करने शुरू किए। प्रचंड कर्फ्यू लागू किए गए। सशस्त्र समूहों ने सरकारी अफसरों, एनसी के एक्टिविस्टों और खुफिया एजेंटों की हत्याएं जारी राखी। हालांकि इनमें से अधिकतर कश्मीरी मुसलमान थे (200 के करीब), एक बड़ी संख्या कश्मीरी हिंदुओं की भी थी (70 के करीब), जो सरकार में ऊंचे पदों पर थे और आबादी में जिनकी संख्या तीन प्रति शत के आसपास थी। 19 जनवरी को हजारों हिंदू परिवार कश्मीर छोड़ दक्षिण में जम्मू की तरफ चले गए। (सालों बाद बहुत से हिंदू दावा करेंगे कि वे अपने घरों से इसलिए निकल गए, क्योंकि उनकी जान को खतरा था और मिलिटेन्ट समूहों ने उन्हें धमकाया था, जबकि बहुत से कश्मीरी मुसलमान जगमोहन पर आरोप लगाएंगे कि उसने हिंदुओं को कश्मीर से निकालने के लिए मनाया, उनके सफर को सुगम बनाया और उन्हें बताया कि वे सर्दियों के बाद वापस आ सकेंगे, क्योंकि तब तक वह घाटी में विरोध को पूरी तरह से खत्म कर देगा। सरकारी सूत्रों के अनुसार, 1989 और 2004 के बीच सशस्त्र मिलिटेन्ट द्वारा 219 कश्मीरी हिंदू मारे गए और उसके बाद एक, जबकि 1,65,000 हिंदुओं ने कश्मीर छोड़ा।) 21 जनवरी को सृनगर के गौकदल में भारतीय सैनिकों द्वारा लगभग 55–65 निहत्थे प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी गई। उसी दिन शाम में जगमोहन ने लंबा कर्फ्यू एवं घेराबंदी लागू की, जिसके कारण बर्फीली सर्दियों में लोगों को बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ा। 25 जनवरी को भारतीय बलों ने हंडवोर टाउन में 21 प्रदर्शनकारियों को मार गिराया। मार्च 1 को भारतीय सैनिकों ने सृनगर के टेंगपोर के पास लगभग 50 कश्मीरी प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी। मार्च की शुरुआत में लगभग दस लाख कश्मीरी कई दिनों के लिए सड़कों पर उतर आए। भारतीय सैनिकों ने दर्जनों को मौत के घाट उतार दिया। 30 मार्च को जेकेएलएफ के कमांडर और सशस्त्र संघर्ष के मुख्य निर्माता अशफाक़ वानी की आक्रमण के दौरान हत्या कर दी गई। उनकी मृत्यु से आंदोलन को पहला भारी झटका पहुंचा। सैकड़ों-हज़ारों लोग उनके जनाज़े में शामिल हुए। सैकड़ों कश्मीरी युवा एलओसी पार चले गए और फिर जेकेएलएफ से जुड़ने के लिए वापस लौटे। एचएम में भी कई क्टिविस्ट भर्ती हुए। जबकि जेकेएलएफ सेक्युलर होने का दावा करता है और कश्मीर की “स्वतंत्रता और एकीकरण” की इच्छा रखता है, एचएम “इस्लामी” संगठन होने का दावा करता है जिसका उद्देश्य कश्मीर को “पाकिस्तान में सम्मिलित” करना है। मई 21 को कुछ दस लाख लोग कश्मीर के मुख्य मौलवी मीरवाइज़ मौलवी फारूक के जनाज़े में शामिल होते हैं। उनकी हत्या के लिए एचएम कार्यकर्ता को दोषी ठहराया जाता है। कुछ कश्मीरी दावा करते हैं कि उस एचएम कार्यकर्ता को जेल से सिर्फ इसी काम को अंजाम देने के लिए रिहा किया गया था। सृनगर के पास हवल में भारतीय अर्धसैनिक बल 60 जनाज़े में शामिल लोगों को मार देते हैं और 200 को ज़ख्मी कर देते हैं। हज़ारों हथियारबंद कश्मीरी एजेके ट्रेनिंग कैम्प से लौटकर आते हैं और उनको पब्लिक से भारी समर्थन मिलता है। भारतीय सरकार जगमोहन को राज्यपाल के पद से हटाकर गिरीश सक्सेना को नया राज्यपाल नियुक्त करती है। भारत सरकार क्षेत्र में सैनिक भेजना जारी रखती है। अब कश्मीर में 3,00,000 से अधिक सैनिक ड्यूटी कर रहे हैं। गर्मी आने तक भारत कश्मीर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्पा) लागू कर देता है, जिसके तहत सेना को मनमानी करने की अनुमति मिलती है।

 

1991

दमन के जारी रहने से कश्मीर में सशस्त्र समूह भी बढ़ते जाते हैं। जेकेएलएफ अभी भी प्रमुख स्थान पर है, लेकिन पाकिस्तान के चहेते एचएम के पास अब ट्रेन हुए अधिक काडर हैं, बेहतर हथियार हैं और उन्हें जमात-ए-इस्लामी ने अपने सशस्त्र विंग के रूप में अपना लिया है। भारतीय सेना विद्रोह को दबाने में असफल रहती है। जंग में हजारों कश्मीरी अपनी जान गंवा रहे हैं। 23 फरवरी को भारतीय सैनिक उत्तर कश्मीर के कुनन और पोशपोरा नामक दो गांवों में घुसते हैं और दर्जनों कश्मीरी औरतों का बलात्कार करते हैं। भारतीय सरकार आरोप से इनकार करती है। (बाद में भारतीय प्रेस परिषद की समिति घोषित करती है कि वे औरतें झूठ बोल रही हैं, लेकिन कश्मीरी एक्टिविस्ट तर्क देते हैं कि समिति उन औरतों से कभी मिली भी नहीं।)

 

1992

एचएम को ग्रामीण इलाकों में अधिक नए सदस्य मिलने लगे, खासकर उन इलाकों में जहां जमात-ए-इस्लामी प्रभावी है। अफगानिस्तान युद्ध के वयोवृद्ध और पकिस्तानियों सहित एचएम में अब हजारों लोग शामिल हैं। जेकेएलएफ अभी भी प्रभावशाली है लेकिन उसके मुख्य कमांडर या तो जेल में हैं या मारे जा चुके हैं। उनके दूसरे मुख्य कमांडर यासीन मालिक 1990 से जेल में कैद हैं। जेकेएलएफ और एचएम में तनाव बढ़ रहा है, क्योंकि एचएम अपना वर्चस्व जमाने की कोशिश कर रहा है। मास्टर अहसान डर को पाकिस्तान में आधारित सैयद सलाहुद्दीन द्वारा एचएम से बेदखल कर दिया जाता है, क्योंकि वह जेकेएलएफ पर एचएम द्वारा किए गए आक्रमण की निंदा करते हैं। डर मुस्लिम मुजाहिद्दीन नामक छोटे संगठन की स्थापना करते हैं। इस अवधि में लगभग 5 लाख भारतीय सैनिक कश्मीर में तैनात किए जाते हैं। प्रसिद्ध मानवाधिकार एक्टिविस्ट और श्रम संघवादी एचएन वानचू की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है।

 

1993

ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना होती है, जो विभिन्न कश्मीरी राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठनों का गठबंधन है। उसका प्रथम उद्देश्य कश्मीर के लिए “आत्मनिर्णय का अधिकार” जीतना है। हालांकि, वह इस सवाल को खुला छोड़ देते हैं कि कश्मीर स्वतंत्र देश बनेगा या पाकिस्तान के साथ जुड़ेगा। सशस्त्र आंदोलन के जारी रहने से भारतीय सैन्य दमन बढ़ता जाता है। जनवरी में उत्तर कश्मीर के सोपोर टाउन में जेकेएलएफ द्वारा किए गए आक्रमण के जवाब में भारतीय अर्धसैनिक दल सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) सौ से भी अधिक निहत्थे नागरिकों की हत्या कर देता है और कई मोहल्लों को जला कर राख कर देता है। अप्रैल में प्रसिद्ध कश्मीरी हार्ट सर्जन और जेकेएलएफ के साथ सहानुभूति रखने वाले अब्दुल अहद गुरु की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। (बाद में एक प्रमुख भारतीय नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर एचएम के एक्टिविस्ट के साथ मिलकर गुरु की हत्या करने का आरोप लगाएंगे।) अक्तूबर में बीएसएफ ने दक्षिण कश्मीर के ब्रिजब्योर टाउन में जुम्मे की नमाज़ के बाद इकट्ठे हुए 55 लोगों की हत्या की। कई बार आपसी मेल बैठाने के बावजूद अंतरसमूह प्रतिद्वंद्विता के कारण जेकेएलएफ और एचएम के बीच टकराव जारी रहते हैं। बेहतर ट्रेन हुए एचएम काडर जेकेएलएफ के दर्जनों सदस्यों को मार गिराते हैं।

 

1994

22 फरवरी को भारतीय संसद प्रस्ताव पारित करती है, जिसमें दावा किया जाता है कि कश्मीर भारत का “अभिन्न अंग” है, इसलिए इसके भारत संघ का हिस्सा नहीं होने के ऊपर कोई बातचीत संभव नहीं है। सशस्त्र आंदोलन को कुचलने और चुनाव करवाने के लिए कश्मीर में और सैनिक भेजे जाते हैं। मई में जेकेएलएफ के कमांडर  यासीन मालिक, जो कि बेल पर बाहर हैं, एकतरफा युद्धविराम घोषित करते हैं और दावा करते हैं कि जेकेएलएफ निःशस्त्र राजनीतिक संगठन है, जो कश्मीर को आज़ादी दिलाने के लिए काम करेगा। उनके इस निर्णय से जेकेएलएफ टूट जाता है। जेकेएलएफ का एक गुट युद्धविराम मानने से इनकार कर देता है, मगर उसके लीडरों को सृनगर में घेराबंदी के दौरान भारतीय सेना द्वारा जल्द ही मार दिया जाता है। जून में पूर्व एमयूएफ विधायक और दक्षिण कश्मीर के मुख्य मौलवी काज़ी निसार की इस्लामाबाद/अनंतनाग में गोली मार कर हत्या कर दी जाती है। इसके लिए बहुत से लोग एचएम को दोषी ठहराते हैं। हरकत उल मुजाहिदीन जैसे कई अखिल-इस्लामी समूह भी अब कश्मीर के कई हिस्सों में मौजूद हैं। अब चूंकि जेकेएलएफ उसका प्रतिस्पर्धी नहीं रहा है, इसलिए एचएम छोटे समूहों के सदस्यों को निशाना बनाना शुरू कर देता है। मुस्लिम मुजाहिद्दीन सहित इनमें से बहुत-से समूह भारतीय बलों को आत्मसमर्पण कर देते हैं। निसार की हत्या के कारण जमात से लोगों का मोहभंग हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें एचएम संरक्षक के रूप में देखते थे। भारतीय सूचना एजेंसियों की मदद से आत्मसमर्पित मिलिटेन्ट नया समूह बनाते हैं, इख्वानुल मुस्लिमीन या सिर्फ “इख्वान”। अहसान डर के नियंत्रण से बाहर होने के बाद मुस्लिम मुजाहिद्दीन (एमएम) अपना नाम तो वही रखती है लेकिन अब भारतीय बलों के लिए काम करना शुरू कर देती है। इख्वानी और एमएम ग्रामीण इलाकों में दर्जनों जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों की हत्या करते हैं, और बहुतों को सृनगर भागने पर मजबूर कर देते हैं। एचएम बनाम इख्वान लड़ाई शुरू होती है, जिसमें भयंकर रक्तपात होता है। इख्वान/एमएम के लगातार आक्रमण के कारण एचएम अपना वर्चस्व खो देती है।

 

1995

विदेशी सशस्त्र मुजाहिद्दीन, खासकर वे जो हरकत उल मुजाहिदीन (बाद में हरकत उल अंसर) से जुड़े थे, कश्मीर युद्ध में प्रभावी बल के तौर पर उभरते हैं। उनके उद्देश्य अस्पष्ट हैं लेकिन उनकी मौजूदगी से और अधिक कन्फ़्युशन पैदा होता है। वे जिहाद की लड़ाई लड़ने का दावा करते हैं लेकिन उनमें से कुछ इख्वान/एमएम के साथ मिलीभगत में पाए जाते हैं। जुलाई 4 को अल फरन नामक हरकत का गुट दक्षिण कश्मीर में पांच पश्चिमी पर्यटकों का अपहरण कर लेता है और कुछ महीनों बाद—जैसा कि पत्रकार एड्रियन लिवी और कैथी स्कॉट की द मेडो नामक किताब में बताया गया है—उन्हें एक एमएम कमांडर के हवाले कर देता है। लोगों का मानना है कि वह उन पांचों का कत्ल कर देता है।

 

1996

मार्च 8 को प्रसिद्ध कश्मीरी मानवाधिकार एक्टिविस्ट और वकील जलील अंद्राबी को भारतीय सेना के अफसर अवतार गिल द्वारा अगवा कर लिया जाता है। बाद में अंद्राबी का शव नदी से बरामद होता है। सितंबर में भारत कश्मीर में चुनाव करवाता है। एनसी चुनावों में हिस्सा ले रही है। जमात चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही है। इख्वान/एमएम के सदस्य चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक संगठन बनाते हैं। एनसी विजेता घोषित कर दी जाती है और फारूक अब्दुल्लाह मुख्यमंत्री बन जाते हैं।

 

1997

इख्वानियों के भयंकर दबाव में आकर जमात एचएम से अपने सारे संबंध तोड़ देती है। एचएम  इख्वानियों पर व्यवस्थित तरीके से आक्रमण कर उनका खात्मा कर देती है। ग्रामीण इलाकों में एचएम वापस वर्चस्व जमा लेती है लेकिन इस दौरान भारतीय सेना ने भी अपनी शक्ति में काफी बढ़ोतरी कर ली है।

 

1998

25 जनवरी को 23 कश्मीरी हिंदू वंधामा गांव में हुए हत्याकांड में मारे जाते हैं। भारत इसका दोष इस्लामी मिलिटेन्ट पर डालता है। जम्मू के प्राणकोट और चंपानरी में अप्रैल और जून में हुए दो अन्य हादसों में कई हिंदुओं की हत्या कर दी जाती है। सशस्त्र आंदोलन जम्मू प्रांत के मुसलमान ज़िलों तक पहुंच गया है। कश्मीर घाटी में भारत का जवाबी कार्रवाई वाला युद्ध जारी रहता है। साल दर साल सैकड़ों कश्मीरियों की हत्या हो रही है। मई में भारत और पाकिस्तान परमाणु परीक्षण करते हैं।

 

1999

एलओसी पर स्थित कारगिल ज़िले में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जाता है। भारत पाकिस्तानी सैनिकों पर एलओसी के भारतीय नियंत्रित क्षेत्र में घुसपैठ करने का इल्ज़ाम लगता है। युद्ध में सैकड़ों सैनिक मारे जाते हैं। जुलाई तक अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते पाकिस्तान को अपने सैनिक वापस बुलाने पड़ते हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ जनरल परवेज मुशर्रफ पर सरकार को बिना बताए युद्ध शुरू करने का आरोप लगाते हैं।

 

2000

मार्च 20 को अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दौरे के कुछ ही दिन पहले दक्षिण कश्मीर के छत्तीसिंहपोर गांव में 35 कश्मीरी सिखों को अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा मार दिया जाता है। सरकार इसका दोष इस्लामी मिलिटेन्ट पर डालती है, लेकिन कश्मीरी और प्रमुख सिख लीडर (बाद में अमरीकी अफसर भी) इसका दोष भारतीय सरकारी एजेंसियों पर डालते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने यह आक्रमण अमरीका की सहानुभूति पाने के लिए करवाए। इस हत्याकांड में भारतीय एजेंसियों के हाथ होने के दावे को और पुष्टि तब मिलती है जब इस हत्याकांड के थोड़े दिन बाद भारतीय बल पांच स्थानीय कश्मीरियों को अगवा करते हैं, मारते हैं और उनके शरीरों को विकृत करने के बाद दावा करते हैं कि ये वही विदेशी मिलिटेन्ट थे जिन्होंने सिखों को मारा था। एक हफ्ते बाद इस्लामाबाद/अनंतनाग के बराकपोर में भारतीय बल निष्पक्ष जांच की मांग करते 9 प्रदर्शनकारियों की हत्या कर देते हैं। एनसी की सरकार के डीएनए को बिगाड़ने के प्रयासों के बावजूद, कब्र से खोदकर निकली गई लाशों के डीएनए परीक्षण से साबित हो जाता है कि वे पांच मृत ‘विदेशी मिलिटेन्ट’ असल में स्थानीय नागरिक ही थे।

 

2001

जुलाई में भारत और पाकिस्तान के नेता एक-दूसरे से मिलते हैं लेकिन कश्मीर मुद्दे पर किसी तरह के समझौते पर नहीं पहुंच पाते। हालांकि, मुक्त व्यापार, असैनिकीकरण और साझी स्वायत्तता की योजनाओं पर बातचीत होती है। अमेरिका पर 11 सितंबर के दिन हुए हमले को मद्देनजर रखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अमरीकी राष्ट्रपति बुश से आग्रह करते हैं कि उनके “आतंकवाद के खिलाफ युद्ध” को कश्मीर तक फैलाया जाए। एपीएचसी और जेकेएलएफ इस मुहिम का अवसरवादी होने के नाम कर खंडन करते हैं। अमेरिका पाकिस्तान से अफगानिस्तान में सहयोग की मांग करता है और पाकिस्तान को “प्रमुख गैर-नेटो मित्र” घोषित करता है। पाकिस्तान कश्मीरी समूहों को दी जा रही सहायता में भारी घटौती करता है। दिसंबर में भारतीय संसद पर हुए हमले के बाद, जिसके लिए भारत कश्मीर में कार्यरत पाकिस्तान समर्थित समूहों लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद को दोषी ठहरता है, भारतीय पुलिस पांच कश्मीरियों को गिरफ्तार कर लेती है, यद्यपि सारे हमलावर मर चुके हैं और दावा है कि पाकिस्तान से हैं। भारत सीमा पर एक साल तक सेना इकट्ठी करता है और पाकिस्तान से युद्ध करने की धमकियां देता रहता है।

 

2002

मई 21 को प्रमुख एपीएचसी लीडर अब्दुल गनी लोन की अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा हत्या कर दी जाती है। भारत पाकिस्तान आईएसआई और एपीएचसी के कट्टरवादी गुटों को दोषी ठहरता है, जबकि कश्मीर में बहुत से लोग भारतीय एजेंसियों पर आरोप लगाते हैं। अक्तूबर में कश्मीर में पैदा हुए पूर्व भारतीय गृह मंत्री मुफ्ती सईद और उनकी नवगठित पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) चुनाव जीत जाती है और कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाती है। पीडीपी ने अपना चुनाव प्रचार कश्मीर में “स्व-शासन” स्थापित करने के वादे के साथ किया था। एनसी ने चुनाव प्रचार 1953 के पूर्व की “स्वायत्तता” वापस स्थापित करने के वादे पर किया था। बचे-कूचे इख्वान नियमित भारतीय और कश्मीरी पुलिस बलों में सम्मिलित हो जाते हैं।

 

2003

कश्मीर में एपीएचसी का विभाजन हो जाता है। सैय्यद अली शाह गिलानी एपीएचसी के कुछ गुटों पर चुनावों के बहिष्कार के आह्वान के बावजूद स्थानीय चुनावों में प्रॉक्सी उम्मीदवार खड़े करने का आरोप लगाते हैं। अप्रैल में भारत मुसलमान क्रांतिकारियों के खिलाफ जम्मू में प्रबल कार्रवाई करता है। दर्जनों की हत्या कर दी जाती है। मई में भारत और पाकिस्तान एलओसी पर युद्धविराम की घोषणा करते हैं, राजनयिक संबंध बहाल करते हैं और बाद में लाहौर और अमृतसर के बीच “बस सेवा” शुरू करते हैं।

 

2004

गीलानी जमात-ए-इस्लामी में अपने आधिकारिक पद को छोड़कर तहरीक-ए-हुर्रियत का गठन करते हैं। सितंबर में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ कश्मीर के मुद्दे पर बातचीत करने के लिए न्यूयॉर्क में मिलते हैं।

 

2006

भारत और पाकिस्तान शांति वार्ता आयोजित करते हैं। मुशर्रफ शांति के लिए 4-पॉइंट फार्मूला पेश करते हैं। इस प्लान में शामिल हैं: 1) कश्मीरियों के लिए एलओसी के पार स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति; 2) एलओसी के दोनों तरफ कश्मीरियों को स्वायत्तता; 3) कश्मीर से पाकिस्तान और भारत के सैनिकों की चरणबद्ध वापसी; 4) भारत और पाकिस्तान जम्मू और कश्मीर में संयुक्त पर्यवेक्षण तंत्र का गठन करेंगे, जो पिछले तीन पॉइंट को लागू करेगा और भविष्य में अंतिम उपाय तक पहुंचने का रास्ता बनाएगा। गीलानी का गुट 4-पॉइंट योजना को अस्वीकार करता है और “कट्टरपंथी” के रूप में जाना जाने लगता है। मीरवाइज़ उमर फरूक के नेतृत्व वाला एपीएचसी का गुट इस योजना का समर्थन करता है। उनके रुख के आधार पर उन्हें “नरम एपीएचसी” के तौर पर जाना जाने लगता है। यासीन मालिक के नेतृत्व वाला जेकेएलएफ कश्मीर के अंतिम उपाय में कश्मीरियों को शामिल करने की मांग करता है।

 

2007

कश्मीरियों को शामिल करने के लिए भारत और पाकिस्तान पर ज़ोर डालने के वास्ते जेकेएलएफ ‘सफर-ए-आज़ादी’ नामक जनसंपर्क कार्यक्रम शुरू करता है। गीलानी दावा करते हैं कि 4-पॉइंट योजना कश्मीर विवाद को स्थिर बनाने का प्रयास है। 

 

2008

भारतीय राज्यपाल और पीडीपी-कांग्रेस सरकार कश्मीर में 100 एकड़ ज़मीन गैर-कश्मीरी संस्था अमरनाथ श्राइन बोर्ड को भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए स्थायी संरचना का निर्माण करने के लिए देते हैं। यह “ज़मीन का सौदा” ज़मीन का स्वामित्व उन लोगों को देकर जो कश्मीर के स्थायी निवासी नहीं है, अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए के प्रावधानों द्वारा ज़मीन की सुरक्षा की गारंटी का उल्लंघन करता है। यह ज़मीन का सौदा पारिस्थितिक रूप से नाजुक पहाड़ी इलाके को भी खतरे में डालता है। बहुत से कश्मीरी इसको कश्मीर की जनसांख्यिकी बदलने के प्रयास के रूप में देखते हैं। जून तक कश्मीर में व्यापक तौर पर विरोध प्रदर्शन होने लगते हैं। इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व समन्वय समिति द्वारा किया जाता है, जिसमें एपीएचसी के कुछ गुट, जेकेएलएफ और कई नागरिक समाज समूह शामिल होते हैं। लाखों कश्मीरी साप्ताहिक विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हैं। भारतीय प्रतिहिंसा तेजी से शुरू होती है। अगले कुछ महीनों में सौ से अधिक प्रदर्शनकारी मारे जाते हैं और हजारों घायल होते हैं। ज़मीन सौदे को रद्द कर दिया जाता है। जम्मू में क्रोधित हिंदू राष्ट्रवादी कश्मीर तक जाते अकेले राजमार्ग को बंद कर हफ्तों तक आर्थिक घेराबंदी कर देते हैं। जम्मू घेराबंदी के कारण उत्पन्न पीड़ा को कम करने और बॉर्डर को खोलने के लिए एलओसी तक निकाले गए जुलूस के दौरान, भारतीय बल प्रसिद्ध कश्मीरी लीडर और मुख्य एपीएचसी लीडर शेख अज़ीज़ को बीस और लोगों के साथ मार गिराते हैं। इन हत्याओं के कारण सैकड़ों कश्मीरी युवा सड़कों पर निकल आते हैं और भारतीय सैनिकों का पत्थरों के साथ सामना करते हैं। भारत कई महीनों के लिए कश्मीर में कर्फ्यू लागू कर देता है। पीडीपी-कांग्रेस की गठबंधन वाली सरकार गिर जाती है। इस दौरान पाकिस्तान में वकीलों द्वारा एक महीने से चल रहे विरोध के कारण मुशर्रफ को राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना पड़ता है। 4-पॉइंट योजना का सबसे अहम समर्थक अब पिक्चर में नहीं है। एपीएचसी के “नर्म” और “कट्टरपंथी” गुटों के बीच संघर्ष बना हुआ है। नवंबर में मुंबई में एलईटी द्वारा किए गए हमले भारत और पाकिस्तान के बीच आधिकारिक शांति वार्ता को खत्म कर देते हैं। एलओसी पर फिर से गोलाबारी शुरू हो जाती है और सरहद के दोनों तरफ सैकड़ों कश्मीरी मारे जाते हैं।

 

2009

मई में शोपियां में दो कश्मीरी औरतों के बलात्कार और हत्या के कारण कश्मीर में व्यापक तौर पर विरोध प्रदर्शन होने लगते हैं। मुक्त जांच दर्शाती है कि जुर्म में भारतीय बलों का हाथ था; डॉक्टर्स साबित करते हैं कि बलात्कार हुआ था। भारतीय सरकार दावा करती है कि वे दोनों औरतें नदी में डूब कर मर गईं और जांच को बंद कर देती है। व्यापक विरोध प्रदर्शन महीनों तक चलते हैं। जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री और शेख अब्दुल्लाह के पोते, उमर अब्दुल्लाह, जो दिल्ली में हिंदू राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार में जूनियर मंत्री का पद संभाल चुके हैं, शुरुआत में पीड़ितों का पक्ष लेते हैं और फिर एकदम से पलटी मारते हुए कहते हैं कि दोनों औरतें छिछले पानी में डूब कर मर गईं। कश्मीरी मानवाधिकार समूह अत्यधिक सैन्यीकृत उत्तर कश्मीर के तीन ज़िलों में 2700 अचिह्नित सामूहिक कब्रों का पता लगता है। इन कब्रों में कुछ 2900 अज्ञात शव मिलते हैं। लोगों का मानना है कि इनमें से बहुत-सी लाशें 1989 से कश्मीर में जबरन गायब किए गए 8000 लोगों में से हैं।

 

2010

अप्रैल में भारतीय सेना माछिल, कुपवाड़ा में तीन नागरिकों को मारकर दावा करती है कि वे ‘विदेशी आतंकवादी’ थे। जून में भारतीय बल द्वारा फायर किया गया आंसू बम सिर पर फूटने से 8 वर्षीय तुफ़ैल मट्टू की सृनगर में मृत्यु हो जाती है। उसकी हत्या के कारण विरोध प्रदर्शनों की नई लहर उठती है, जो महीनों तक चलती है। भारतीय बल कर्फ्यू लागू कर “पत्थरबाज़ी” करते सौ से भी ज्यादा युवा कश्मीरियों की हत्या कर देते हैं। हालांकि इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व युवाओं के हाथ में है, फिर भी गीलानी इस दौरान मुख्य नेता के रूप में उभर कर आते हैं और उनका गुट “विरोध प्रदर्शन के कैलेंडर” जारी करता है। गीलानी ग़ैर-सैन्यकरण, राजनीतिक कैदियों की रिहाई और आत्म-निर्णय के अधिकार को लागू करने की स्पष्ट मांग रखते हैं। भारत तीन “वार्ताकार” नियुक्त करता है, लेकिन कश्मीरी नेता दावा करते हैं कि उनके पास कोई अधिदेश नहीं है और उन्हें अस्वीकार कर देते हैं। सर्दियां शुरू होने के ठीक पहले विरोध प्रदर्शन पर रोक लगा दिए जाते हैं। निराश होकर बहुत से कश्मीरी युवा गायब हो जाते हैं और एचएम के सशस्त्र गुट में जुड़ जाते हैं। यह गुट अभी भी सक्रिय है लेकिन अत्यधिक घटी हुईं अवस्था में।

 

2013

फरवरी 9 को भारतीय सरकार संसद पर हुए 2001 के हमले के बाद से जेल में कैद अफ़ज़ल गुरु को फांसी दे देती है। कई भारतीय सिविल सोसाइटी ग्रुप्स दावा करते हैं कि गुरु के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं। गुरु का दावा था कि उन्हें कश्मीर में तैनात भारतीय एजेंटों द्वारा फंसाया जा रहा है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में ‘कुख्यात’ घोषणा की कि गुरु को “भारतीय समाज की सामूहिक अंतरात्मा की संतुष्टि” के लिए फांसी देनी ही होगी। इस व्याख्या की पूरी दुनिया में निंदा की गई। गुरु की लाश को भी उसके परिवार को नहीं दिया गया और वह भी अब तिहाड़ जेल में मक़बूल भट्ट के बगल में दफन हैं।

 

2014

मीरवाइज़ उमर के नेतृत्व वाले एपीएचसी के गुट का विभाजन हो जाता है, क्योंकि उसके सदस्य कहते हैं कि अब यह एकीकरण अप्रभावी हो चुका है। उनमें से कुछ गीलानी के गुट से जुड़ जाते हैं। 2008 से कांग्रेस के साथ एनसी की गठबंधन की सरकार चुनाव हार जाती है।

 

2015

मार्च में पीडीपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी भाजपा सरकार के साथ गठबंधन की सरकार बनाती है। इससे पूरा कश्मीर सदमे में चला जाता है। 1947 के बाद पहली बार कश्मीर में हिंदू राष्ट्रवादी आधिकारिक तौर पर सरकार बना पाए हैं। जम्मू कश्मीर मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट “हिंसा की संरचना” बताती है: “यह रिपोर्ट जम्मू और कश्मीर में भारतीय राज्य की भूमिका को समझने और उसका विश्लेषण करने के चलते हुए प्रयास का हिस्सा है। जम्मू और कश्मीर क्षेत्र के ऊपर कब्ज़ा किया जा चुका है और उसे अंतर्राष्ट्रीय तौर पर भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित क्षेत्र की मान्यता प्राप्त है। भारतीय राज्य ने इस क्षेत्र में व्यापक और व्यवस्थित तौर पर हिंसा का सहारा लिया है, जिसके चलते 8,000 से अधिक लोग गायब किए जा चुके हैं, 70,000 से अधिक लोगों की हत्या की जा चुकी है, 6,000 से अधिक अज्ञात, अचिह्नित, सामूहिक कब्रें बनाई गई हैं और अनगिनत लोगों को टॉर्चर और यौन उत्पीड़न झेलना पड़ा है।” रिपोर्ट अनुमान लगती है कि जम्मू और कश्मीर में “656,638 और 750,981” के बीच भारतीय सैन्य बल के कर्मी मौजूद हैं।

 

2016

8 जुलाई को भारतीय बल एचएम के 22 वर्षीय कमांडर बुरहान वानी की हत्या कर देते हैं। वह आंशिक तौर पर सोशल मीडिया के इस्तेमाल के कारण कश्मीरी युवाओं में मशहूर था। कश्मीर में “पत्थरबाज़” वाले विरोध प्रदर्शन भड़क उठते हैं। भारतीय बल दर्जनों कश्मीरी युवाओं की हत्या कर देते हैं और सैकड़ों को अंधा कर देते हैं। 5 लाख के करीब लोग वानी के होमटाउन त्राल में उसके जनाज़े में शामिल होने के लिए इकट्ठा होते हैं। महीनों लंबा कर्फ्यू लागू किया जाता है। वानी की मृत्यु “नए युग की मिलीटेंसी” को छाया से बाहर ले आती है। दक्षिण कश्मीर में विरोध तीव्र हो जाता है। ठीक से मीडिया समझने वाले और प्रभावी नए युग के युवा कश्मीरी मिलिटेन्ट लोकप्रिय बन जाते हैं। उनको मारने के लिए भारत द्वारा की गई हर घेराबंदी के खिलाफ इन युवाओं की सुरक्षा के लिए पूरे के पूरे गांव उठ खड़े होते हैं। हर बार भारतीय बल जब किसी युवा का कत्ल करते हैं तब हजारों कश्मीरी विरोध में सड़कों पर उतर आते हैं।

 

2017

“ऑपरेशन ऑल आउट” नामक भारत का जवाबी कार्रवाई का युद्ध दक्षिण कश्मीर में अधिक तीव्र हो जाता है। सैकड़ों लोगों की हत्या होती है, उनमें से अधिकतर युवक कश्मीरी मिलिटेन्ट और नागरिक हैं।

 

2018

जून में भाजपा पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़ देती है और कश्मीर भारतीय राज्यपाल के अधीन आ जाता है। नवंबर में राज्यपाल विधानसभा भंग कर देता है।

 

2019

फरवरी में एक कश्मीरी दक्षिण कश्मीर में भारतीय रक्षक दल पर बम मारकर 40 सैनिकों की हत्या कर देता है। भारत पाकिस्तान में वायु हमले करता है। अगले दिन, पाकिस्तान भारत द्वारा कब्ज़ा किए गए कश्मीर के क्षेत्र पर वायु हमले करता है और भारतीय जेट को मार गिराता है, जबकि भारतीय बल गलती से खुद के ही हेलीकॉप्टर पर हमला कर देते हैं। पाकिस्तान पकड़े गए भारतीय वायुसेना के एक पायलट को लौटा देता है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं होता। भारत जेकेएलएफ और जमात-ए- इस्लामी पर प्रतिबंध लगाकर यासीन मालिक सहित उनके कई नेताओं को गिरफ्तार कर लेता है। एपीएचसी के एक्टिविस्टों के खिलाफ कश्मीर में व्यापक तौर से भारी क्रैकडाउन होता है। हजारों कश्मीरी राजनीतिक और नागरिक समाज के एक्टिविस्टों को छापों में गिरफ्तार कर लिया जाता है। जुलाई के अंत में सैकड़ों हजारों की संख्या में नए भारतीय बल कश्मीर में घुसते हैं। अगस्त 5 को भारतीय सरकार अनुच्छेद 370 को निरस्त करती है और अनुच्छेद 35A को पूरी तरह से रद्द कर देती है। इससे अंगीकार पत्र और दिल्ली समझौते द्वारा गारंटी किए गए कश्मीर में “स्वायत्तता” और “विशेष स्थिति” के आखिरी बचे-कूचे अवशेष को भी खत्म कर दिया जाता है। 35A के हट जाने से कश्मीर में भारतीय नागरिकों के बसने का रास्ता साफ हो जाता है, जो आरएसएस की लंबे समय से मांग भी रही है। एनसी और पीडीपी के नेताओं को नजरबंदी में रखा जाता है। कश्मीर पूर्ण कर्फ्यू की स्थिति में है और संचार के सारे साधन पूरी तरह से बंद हैं। अक्तूबर 31 को भारतीय सरकार जम्मू और कश्मीर के ऐतिहासिक राज्य को अगस्त 9 को पारित किए गए जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत दो “केंद्र शासित प्रदेशों” में विभाजित कर देती है। एक है “जम्मू और कश्मीर का केंद्र शासित प्रदेश”, जिसमें अत्यधिक सीमित शक्तियों वाली विधानसभा होगी और दूसरा है “लद्दाख का केंद्र शासित प्रदेश”, जिसमें कोई विधानसभा नहीं होगी। भारत सरकार ज़मीन के इस्तेमाल का और निवास की आवश्यकताओं का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है। इस दौरान, सरकार के अधिकारी कश्मीर में “इज़राइल शैली के निवासी उपनिवेश” स्थापित करने की बात करते हैं। कश्मीर में गहन क्रैकडाउन और संचार प्रतिबंध निश्चित करते हैं कि कश्मीरी विरोध न कर पाएं। पाकिस्तान और चीन भारत के इस कदम का विरोध करते हैं। पश्चिम में बसे कश्मीरी प्रवासी प्रतिरोध की मुख्य आवाज़ बनते हैं।

 

2020

भारत सरकार जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश के लिए नया “अधिवास कानून” लागू करती है, जिसके तहत भारतीय नागरिकों के कुछ वर्ग कश्मीर के स्थायी निवासी बन सकेंगे। कश्मीर में भारतीय अधिकारी भारतीयों को प्रमाणपत्र देने लगते हैं, जिनके तहत वे कश्मीर में ज़मीन खरीद सकेंगे। जून में भारतीय और चीनी बल लद्दाख की सीमा पर एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। 20 भारतीय सैनिकों की मृत्यु होती है और चीन भारत को उसकी दावा की गई सीमा से कई किलोमीटर अंदर खदेड़ देता है। जुलाई में गीलानी एपीएचसी में अपने गुट को छोड़ देते हैं, जिससे उनके 70 साल लंबे राजनीतिक जीवन का अंत हो जाता है। भारत सरकार क्षेत्र में सैन्य अड्डे बढ़ाने और हजारों “नए घर” बनाने के लिए नए कानून लागू करती है।                                                                                                          

 

मोहम्मद जुनैद
मोहम्मद जुनैद

मोहम्मद जुनैद मैसाचुसेट्स कॉलेज ऑफ लिब्रल आर्ट्स में मानव विज्ञान के असिस्टन्ट प्रोफेसर हैं। उन्होंने कश्मीर के इतिहास और सैन्य कब्ज़े के ऊपर विस्तार में लिखा है। मोहम्मद जुनैद मैसाचुसेट्स कॉलेज ऑफ लिब्रल आर्ट्स में मानव विज्ञान के असिस्टन्ट प्रोफेसर हैं। उन्होंने कश्मीर के इतिहास और सैन्य कब्ज़े के ऊपर विस्तार में लिखा है।