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चीन की कामयाबी की हक़ीक़त

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April 10, 2026

चीन की कामयाबी की हक़ीक़त

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Photo: Shutterstock

 

फ़ारस की खाड़ी के आसमान में मिसाइलें, बम और ड्रोन मंडरा रहे हैं, और इसी के साथ प्रशांत क्षेत्र में एक और भी तबाहकुन युद्ध की आशंका गहरी होती जा रही है। ऐसे में अमेरिका और चीन के बीच छिड़े नए शीत युद्ध को क़ाबू में लाना अब पूरी दुनिया की प्राथमिकता बनना चाहिए। लेकिन इसके लिए सबसे पहले उस ताक़तवर मिथक को तोड़ना होगा, जो युद्ध की आशंका को और बढ़ाता है : यह दावा कि चीन अपनी समृद्धि तक धोखा देकर पहुंचा है।

चीनी अर्थव्यवस्था दुनिया में बड़े पैमाने के आर्थिक असंतुलन पैदा कर रही है, और इस पर गंभीरता से बात होनी चाहिए। लेकिन यह बात उस सुविधाजनक झूठ से बिल्कुल अलग है, जिसे पश्चिमी अभिजात तबकों ने अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए गढ़ा है : कि चीन की कामयाबी की बुनियाद धूर्तता, बेईमानी और छल पर टिकी है। और यह सिर्फ एक सुविधाजनक झूठ नहीं है। जिस हद तक यह पश्चिमी जनमत को युद्ध के लिए तैयार करता है, उस हद तक यह ख़तरनाक भी है।

इस मिथक के भीतर पाँच झूठे आरोप छिपे हैं। पहला आरोप यह है कि चीन ने पश्चिमी कंपनियों की बौद्धिक संपदा “चुरा” ली। जबकि हक़ीक़त यह है कि पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियां दशकों से चीन के विशाल बाज़ार में दाख़िले के बदले अपनी तकनीक और ज्ञान खुद सौंपती रही हैं। पचास साल आगे की सोच रखने वाले चीनी हुक्मरानों ने बस उनके सामने ऐसी शर्त रखी, जिसे ठुकराना उनके लिए नामुमकिन था : हमारे बाज़ार में आइए, लेकिन इसके बदले हमारे लोगों को भी सिखाइए कि आपके सामान बनते कैसे हैं। पश्चिमी कंपनियों के मुखिया, जो अगली तिमाही के मुनाफ़े में उलझे रहते हैं और मध्यम अवधि के चमकदार नंबरों के सपनों में डूबे रहते हैं, यह सौदा खुशी-खुशी मान गए।

दूसरा आरोप यह है कि चीन अपनी मुद्रा का मूल्य जानबूझकर कम रखता है। इसका मतलब यह हुआ कि विनिमय दर की कोई एक “सही” कीमत होती है और चीनी हुक्मरान रेनमिन्बी को उससे नीचे दबाए हुए हैं। सैद्धांतिक तौर पर विनिमय दर वही सही मानी जाएगी, जो हर देश के चालू खाते को संतुलित रखे। व्यवहार में इसका सीधा मतलब यह होगा कि डॉलर की कीमत ज़रूरत से कहीं ज़्यादा बढ़ी हुई है, और इसका सबसे साफ़ सबूत अमेरिका का भारी-भरकम चालू खाता घाटा है।

सीधी बात यह है कि चीन पर रेनमिन्बी को कृत्रिम रूप से नीचे रखने का आरोप, उसी दावे का दूसरा पहलू है कि अमेरिका विदेशी पूंजी खींचकर अपने घाटों की भरपाई करता है। जिस पश्चिमी दुनिया की अपनी अर्थव्यवस्था एक ज़रूरत से ज़्यादा मजबूत डॉलर के सहारे चल रही हो, उसके लिए चीन पर उंगली उठाना कुछ ज़्यादा ही बेमानी लगता है। कांच के घर में रहकर पत्थर फेंकना समझदारी नहीं है।

तीसरा आरोप चीन के पूंजी नियंत्रण को लेकर है, जिसे धोखाधड़ी का एक और तरीका बताकर पेश किया जाता है। लेकिन क्या हम भूल गए हैं कि पूंजीवाद का वह दौर, जिसे अक्सर उसका स्वर्णकाल कहा जाता है—यानी 1950 और 1960 के दशक का ब्रेटन वुड्स दौर—अमेरिका, यूरोप और जापान में पूंजी नियंत्रण पर ही टिका था? इसकी दलील सीधी थी : किसी भी सरकार पर न तो कानूनी और न ही नैतिक रूप से यह जिम्मेदारी है कि वह वित्तीय पूंजी को मनमर्जी से अपने देश में “गरम” पैसा उड़ेलने दे, या फिर उसी मनमर्जी से पूंजी को बिना रोक-टोक बाहर निकल जाने दे।

इस मिथक का चौथा स्तंभ यह आरोप है कि चीनी उद्योग में भारी पैमाने पर अतिरिक्त क्षमता है। लेकिन आंकड़े इस दावे की तस्दीक नहीं करते। चीन में क्षमता उपयोग 75 फ़ीसदी से नीचे है, जो अमेरिका से भी कम है। भंडार स्थिर हैं। चीनी निर्यातकों के मुनाफ़े में 10 फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़ोतरी हुई है। यानी अतिरिक्त क्षमता का दावा टिकता नहीं।

असल में यह आरोप उस बात से ध्यान हटाने का एक तरीका है, जो पश्चिमी सरकारों को सचमुच परेशान करती है : बेहतरीन योजना प्रणाली और सबकी पहुंच में आने वाली उच्च स्तर की शिक्षा-प्रशिक्षण व्यवस्था के दम पर ही चीन ने असाधारण प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हासिल की है। जब आप देखते हैं कि शेनझेन की कोई कंपनी बहुत कम लागत में चार प्रोटोटाइप तैयार कर लेती है, जबकि स्टुटगार्ट या इलिनॉय में उतने समय और कहीं अधिक लागत में एक प्रोटोटाइप भी मुश्किल से बन पाता है, तब गंभीरता से यह कहना मुश्किल हो जाता है कि चीन की प्रतिस्पर्धा सिर्फ डंपिंग का नतीजा है। लेकिन पश्चिमी नेताओं के लिए अपने मतदाताओं को यह कहना कहीं आसान है कि चीन की बढ़त किसी गड़बड़ी का नतीजा है, बजाय इसके कि वे मानें कि चीन ने विनिर्माण बुद्धिमत्ता का एक अनोखा और बेहद कारगर तंत्र खड़ा कर लिया है।

पाँचवाँ और शायद सबसे आम आरोप यह है कि चीन में लोग बहुत कम खर्च करते हैं और उन्हें कम मज़दूरी मिलती है। हो सकता है, लेकिन किसके मुकाबले? चीन में घरेलू खपत जिस रफ़्तार से बढ़ी है, वह पश्चिम के एशियाई औद्योगिक सहयोगियों—जापान और दक्षिण कोरिया से लेकर इंडोनेशिया और मलेशिया तक—किसी में नहीं दिखती। इतना ही नहीं, जब ये तथाकथित “चमत्कारी अर्थव्यवस्थाएँ” विकास के इसी मुकाम पर पहुँची थीं, तब उनके यहाँ खपत बढ़ने की रफ़्तार तेज़ी से थम गई थी। चीन के मामले में ऐसा नहीं हुआ।

मज़दूरी के सवाल पर भी तस्वीर बिल्कुल अलग है। दो दशक पहले चीन के विनिर्माण क्षेत्र में प्रति घंटा मज़दूरी भारत से भी कम थी। उसके बाद से चीन में यह आठ गुना बढ़ चुकी है, जबकि भारत में सिर्फ दोगुनी हुई है। हालत यह है कि आज एशिया के किसी भी दूसरे विकासशील देश की तुलना में चीन में मज़दूरी ज़्यादा है।

ये सच पश्चिमी सत्ता के गलियारों में बेचैनी पैदा करते हैं। चीन की तकनीकी ताक़त उन पश्चिमी कंपनियों के लिए सीधी चुनौती है, जो कभी खुद को अजेय समझती थीं। अब दूसरे विकासशील देश ज़्यादा भरोसेमंद, बेहतर और सस्ते सामान के लिए चीन की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसे में धोखाधड़ी के आरोपों की शरण लेना समझ में आता है, लेकिन पश्चिम को इस मौके का इस्तेमाल अपने भीतर झांकने के लिए करना चाहिए, क्योंकि सच बोलना आखिरकार शांति के हक़ में जाता है।

और सच यह है कि पश्चिमी कंपनियाँ चीन से हारी नहीं हैं, उन्होंने खुद अपने को चीन के हाथ बेच दिया है। फौरी मुनाफ़े के लालच में उन्होंने नौकरियाँ विदेश भेजीं, ट्रेड यूनियनों को तोड़ा और अपनी बौद्धिक संपदा तक सौंप दी। उधर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ आपराधिक बैंकरों को बचाने और ग़ैरकानूनी युद्ध छेड़ने में लगे रहे, जबकि चीन ने शिक्षा, रेल नेटवर्क, स्वास्थ्य व्यवस्था, हरित ऊर्जा, स्मार्ट ग्रिड और ऐसे विनिर्माण केंद्रों में निवेश किया, जो शोध, विकास और नवाचार की वह क्षमता रखते हैं, जिसकी बराबरी ज़्यादातर पश्चिमी देश नहीं कर सकते।

अब वक्त आ गया है कि पश्चिम अपने बड़े कारोबारी घरानों, वॉल स्ट्रीट और उनके चापलूस राजनेताओं के फ़ैसलों का ठीकरा चीन के सिर फोड़ना बंद करे। चीन पर प्रतिबंध लगाना औद्योगिक नीति का एक बेतुका विकल्प भर है। इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक बात यह है कि वही लोग, जिन्होंने खाड़ी क्षेत्र को आज के दलदल में धकेला, अगर चीन-विरोधी और आलसी नस्लवादी आख्यान फैलाते रहेंगे, तो वे प्रशांत क्षेत्र में एक और भी ज़्यादा सनकी सैन्य टकराव की ज़मीन तैयार कर सकते हैं।

                              

 

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यानिस वारौफाकिस
यानिस वारौफाकिस

लेखक

यानिस वारौफाकिस एक प्रमुख ग्रीक अर्थशास्त्री, लेखक और राजनीतिज्ञ हैं, जो जनवरी से जुलाई 2015 तक ग्रीस के वित्त मंत्री रहे। वह अपनी "टेक्नोफ्यूडलिज्म" (Technofeudalism) की अवधारणा और यूरोपीय संघ की नीतियों की आलोचना के लिए जाने जाते हैं। वर्तमान में, वह पैन-यूरोपीय राजनीतिक आंदोलन DiEM25 (Democracy...

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अक्षत जैन
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