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स्रोत: Weebly
यहाँ मेरी त्वचा भीड़ में अलग से दिखती है। बाहर क़दम रखते ही वो जैसे चौकन्नी हो जाती है, तन जाती है, सख़्त पड़ जाती है, अपने ऊपर ज़ुल्म ढाने लगती है। उसे राहत बस अँधेरे में मिलती है; जब मैं अकेला होता हूँ; जब सुबह बहुत जल्दी आँख खुलती है और दुनिया अभी मुझ पर नज़र नहीं गड़ाए होती; जब हाथ किसी बेदिमाग़ काम में लगे होते हैं; और, अजीब है, जब मैं ग़ुस्से में होता हूँ। लेकिन जैसे ही कुर्सी खींचकर लिखने बैठता हूँ, वो सकुचा जाती है, मानो अपने ही रंग, अपनी ही मौजूदगी से शर्मिंदा हो।
वो एक ख़ामोश दोस्त की तरह है, जो कभी प्यार करता है, कभी गुस्सा होता है, कभी झगड़ता है, कभी रोता है। मेरा एक दोस्त था ऐसा। आख़िर में उसने अपनी कलाइयाँ काट लीं। अब वो पागलख़ाने में है। मैं बार-बार ख़ुद से पूछता रहता हूँ कि उसने ऐसा क्यों किया होगा। मगर आज तक कोई ठोस जवाब मेरे हाथ नहीं लगा।
वो हर वक़्त ख़ुद को धोता रहता था—दिन में कम-से-कम तीन बार नहाता था। तरह-तरह के लोशन, डियोडरेंट, ख़ुशबुएँ, सब उस अदृश्य चीज़ को राज़ी करने के लिए, जिसने उसे भीतर से पकड़ लिया था। वो नहाता कम था, अपनी देह से लड़ता ज़्यादा था; चमड़ी को तब तक रगड़ता जब तक ख़ून न झलक आए।
अपनी ज़बान को भी वो इसी तरह पाक करना चाहता था। अंग्रेज़ी सँवारता रहता, बोलने से अपनी मिट्टी की हर आहट मिटा देना चाहता। उसे सुनना तकलीफ़ देता था, उतनी ही तकलीफ़ जितनी उसे अपनी चमड़ी से कालापन खुरचते हुए देखना।
अपने बालों पर वो ऐसे-ऐसे अत्याचार करता था, जिनको देख कर ख़ुदा भी शर्मा जाए।
कपड़े वो ऐसे ख़रीदता था जैसे पूरे दुकानें घर ले जा रहा हो। अगर कपड़ों से आदमी बनता है, तो जनाब, वह बेशक आदमी था। और जूते? वे ऐसे जूते थे कि हाथी भी पहन ले तो पाँव में हल्कापन और चाल में नफ़ासत उतर आए। जिन जानवरों की खाल उतारकर वे जूते बनाए गए होंगे, वे अपनी क़ब्रों में ज़रूर बोले होंगे, हाँ भाई, ये हुई बात!
लेकिन फिर भी उसे चैन नहीं था। उसके हिसाब से उसके आसपास के सभी अफ़्रीकियों को उसी की राह पकड़नी चाहिए थी। आख़िर बात भी सही थी—अगर एक चिम्पैंज़ी सिर्फ़ चाय पीना ही नहीं, बल्कि टीवी पर उसी चाय का इश्तिहार भी करने लगा, तो उसे क्या हासिल, अगर ख़ुदा के बनाए बाक़ी सारे चिम्पैंज़ी अब भी वहीं बैठे अपनी पिस्सू खुजा रहे हों, दुम हिला रहे हों, और रोड्स और केलों पर चीं-चीं कर रहे हों?
हाँ, इतना लिहाज़ उसमें था कि एक दिन उसने बात मुझसे ज़रा घुमा-फिराकर कही। हम ऑक्सफ़र्ड टाउन हॉल में न्यू ईयर बॉल के लिए जा रहे थे।
“तुम ये जीन्स कभी बदलते नहीं?” उसने पूछा।
“मेरे पास यही एक है,” मैंने कहा।
“अपने पैसे का करते क्या हो, यार? दारू में उड़ा देते हो?”
“हाँ,” मैंने जेबें टटोलते हुए कहा। दारू, काग़ज़ और स्याही। मेरे धंधे के औज़ार।
“तुम्हें अपने हुलिए पर थोड़ा ध्यान देना चाहिए, समझे। हम बंदर नहीं हैं।”
“मैं जैसा हूँ, ठीक हूँ।” मैं खाँसा। और क्योंकि वो जानता था कि मेरी उस खाँसी का मतलब क्या होता है, वो ऐसे तन गया जैसे अभी कोई घूँसा पड़ने वाला हो।
“अगर पैसे हैं,” मैंने सख़्ती से कहा, “तो पाँच पाउंड उधार दे दो।”
उस दिन वो भी उतना ही सख़्त था।
“न उधार देना चाहिए, न उधार लेना चाहिए,” उसने कहीं से उद्धरण जड़ दिया।
फिर जैसे बाद में याद आया हो, बोला, “हम दोनों का नाप एक ही है। मेरा दूसरा सूट पहन लो। चाहो तो रख लो। और पाँच पाउंड भी।”
उसने बात मुझसे इसी तरह कही थी। और सब कुछ इसी तरह चलता रहा, जब तक उसने अपनी कलाइयाँ नहीं काट लीं।
लेकिन बात सिर्फ़ इतनी नहीं थी।
सिर्फ़ हुलिया—चाहे कितना ही महँगा क्यों न हो—समाज की फिसलन भरी चढ़ाइयों पर भरोसेमंद जूते नहीं बन सकता। वह जब भी मुँह खोलता, ख़ुद को हँसी का पात्र बना देता। लॉजिक—यही उसका जादुई शब्द था। मगर बदक़िस्मती से ऐसी चीज़ें अफ़्रीकी रवैयों की तलाश में निकले सबसे मोटी-खाल वाले एंथ्रोपोलॉजिस्ट को भी जल्दी ऊबा देती हैं। मेरी दिलचस्पी पहले दारू में थी, और बहुत बाद में लोगों में। मगर वो—ख़ुदा बचाए—लोगों से घुलने-मिलने के लिए राजनीति का सहारा लेता था। और उस महफ़िल में भला किसे रोडेशिया से घंटा फ़र्क पड़ता था? यह बात उसकी समझ में कभी नहीं आई।
हाय ख़ुदा! नाचने की बारी आती तो वो सचमुच अपने को बंदर बना लेता। उसे हमेशा लगता कि अगर किसी लड़की ने उसके साथ डांस करने की हामी भर दी, तो उसने असल में इस बात की भी हामी भर दी है कि उसे टटोला जाए, भींचा जाए, चूमा जाए और आख़िर में डांस फ़्लोर से बाहर ले जाकर उसके साथ सोया जाए। और लड़कियाँ उसके साथ बिल्कुल बेरहम थीं। बुलावे बंद हो जाते, और चारों तरफ़ ठंडी चुप्पी फैल जाती।
जिस तरह की लड़कियों में उसकी दिलचस्पी होती थी, उनसे मुझे कोई ख़ास मतलब नहीं था। उसे वे लड़कियाँ पसंद थीं जो सलीकेदार हों, शरमाई-सिमटी बैठी रहें, और जिनसे हर बार वही बेबस-सी बातचीत शुरू हो:
“तुम किस कॉलेज से हो?”
“---- तुम?”
ठहराव।
“क्या पढ़ते हो?”
“----- तुम?”
ठहराव। खाँसी।
“मैं ज़िम्बाब्वे से हूँ।”
“वो क्या है?”
“रोडेशिया।”
“ओह। मैं लंदन से हूँ। सुनो,” साफ़-साफ़ ऊबते हुए, “स्मिथ हरामी है, है न?”
और वह तुरंत लपक पड़ता, “दरअसल, मैंने अभी हाल ही में अफ़्रीका सोसाइटी में इसी थीसिस पर बात रखी है कि इयान स्मिथ ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला...”
जंभाई लेते हुए: “दिलचस्प। बहुत दिलचस्प।”
“स्मिथ ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला...”
अचानक: “डांस करोगी?”
चौंककर: “अच्छा... मैं... हाँ, क्यों नहीं।”
और बस, यही था। हाँ, सब कुछ इसी तरह था, जब तक उसने अपनी कलाइयाँ नहीं काट लीं।
लेकिन बात सिर्फ़ इतनी नहीं थी।
एक रात हम यूनिवर्सिटी लिटरेरी सोसाइटी की पार्टी में जा रहे थे कि रास्ते में एक काला आवारागर्द उसके सामने आ खड़ा हुआ। वो ऐसे पीछे हटा जैसे किसी कोढ़ी ने छू लिया हो। सचमुच, उस आदमी से बचकर सिमट गया। वैसे वह आदमी मुझे पहले से जानता था। एक बार क्रिसमस ईव की पूरी रात मैंने और उसने कारफैक्स की एक बेंच पर बैठे व्हिस्की की बोतल ख़त्म करी थी।
घिन से उसका चेहरा फट पड़ने को था। पार्टी में पहुँचकर भी उसे और कोई बात सूझी ही नहीं।
“इंग्लैंड में कोई काला आदमी अपने को इस तरह सड़कछाप कैसे बनने दे सकता है? करने को कितना काम है। ख़ासकर दक्षिणी अफ़्रीका में। मैं तो यह देखना चाहता हूँ कि ब्ला ब्ला ब्ला...”
“एक ड्रिंक लो,” मैंने कहा।
उसने गिलास ऐसे लिया जैसे ख़ुदा शैतान के हाथ से कोई चीज़ क़ुबूल करता हो।
“तुम बहुत ज़्यादा पीते हो, पता है,” उसने आह भरकर कहा।
“और तुम बहुत कम पीते हो,” मैंने कहा।
उस आवारा वाली बात ने उसे जितना कुतरा था, मैंने समझा नहीं था। कॉलेज लौटकर भी उसे नींद नहीं आई। थोड़ी देर बाद वो मेरे कमरे में आ गया, हाथ में वाइन की बोतल थी, जिसे उसके साथ पीने में मुझे कोई एतराज़ नहीं था। हम सुबह तक पीते रहे। तब जाकर उसने उन काले हरामज़ादों के बारे में बोलना बंद किया। बोलना इसलिए बंद किया क्योंकि अपनी कुर्सी पर ही सो गया था।
और सब कुछ इसी तरह चलता रहा, जब तक उसने अपनी कलाइयाँ नहीं काट लीं।
लेकिन कहानी के दूसरे पहलू भी थे। मसलन, उसे लगता था कि उसके एक ट्यूटर को वह पसंद नहीं है।
“उसे किसी को पसंद करना ज़रूरी नहीं,” मैंने कहा, “और तुम्हें भी नहीं।”
मगर वो सुन कहाँ रहा था। उसने अपनी उँगलियाँ चटकाईं और बोला, “मैं उसे क्रिसमस और न्यू ईयर का कार्ड भेजूँगा। सबसे महँगा वाला।”
“उस पैसे से ब्लू नन वाइन क्यों नहीं ख़रीद लेते?” मैंने कहा।
उसने मुझे जिस तरह देखा, मैं समझ गया कि एक दोस्त हाथ से निकल रहा है।
मसलन, एक दिन उसने कहा कि अगर वॉर्डन या कोई ट्यूटर मुझसे पूछे कि क्या मैं उसका दोस्त हूँ, तो मैं साफ़ कह दूँ—नहीं।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“तुम बहुत पीते हो, पता है,” उसने बड़ा सख़्त चेहरा बनाकर कहा। “और मुझे डर है कि तुम कई बार बहुत बुरा बर्ताव करते हो। मसलन, मैंने बीयर-सेलर वाली घटना सुनी है, डाइनिंग रूम वाली भी, कॉर्नमार्केट वाली भी जहाँ पुलिस बुलानी पड़ी थी, और तुम्हारी सीढ़ियों वाली भी...”
मैं मुस्कराया।
“तुम्हारा सूट धुलवाकर तुम्हारे कमरे में भिजवा दूँगा,” मैंने ठोस आवाज़ में कहा, “और वो पाँच पाउंड भी मैं लौटा चुका हूँ। तो हिसाब बराबर है। तुम आज हॉल में खाना खा रहे हो? अगर खा रहे हो तो मैं नहीं आऊँगा। बर्दाश्त के बाहर होगा। सोचो ज़रा। इस कॉलेज में हम बस दो अफ़्रीकी हैं। हम एक-दूसरे से बचकर जाएँगे कहाँ? और फिर...”
उसने माथा सिकोड़ लिया। दर्द था क्या? इधर कुछ दिनों से वो नींद न आने और सिरदर्द की शिकायत करने लगा था, और उसके चश्मे के लेंस भी उसकी कमज़ोर नज़र के हिसाब से ठीक नहीं लगते थे। उसकी आँखों में जैसे कुछ चटक गया था।
“देखो, मेरा मतलब... छोड़ो जो मैंने कहा। मुझे परवाह नहीं कि वे क्या सोचते हैं। मेरा मामला है न, मैं किससे दोस्ती रखूँ?”
मैंने सीधे उसकी आँखों में देखा।
“उन्हें अपना कचरा तुम्हारे अंदर भरने मत दो। या फिर वही कचरा उनके मुँह पर उगल दो। लेकिन उनकी सड़ी-गली बातें मेरे ऊपर कभी मत उगलना।”
कुछ देर बाद उसने कहा, “चलो टेनिस खेलते हैं।”
“नहीं जा सकता। शहर के दूसरे सिरे से एक आदमी के पास से थोड़ा माल लेना है,” मैंने कहा।
“माल? तुम वो सब लेते हो?”
“हाँ। लेबनानी वाला मेरे लिए सबसे बढ़िया नशा है।”
वो सचमुच हिल गया था।
बिना एक शब्द बोले वो मुड़ गया। मैं उसे जाता देखता रहा, बस यही उम्मीद करते हुए कि वो अपने-आप को इतना न चढ़ा ले कि जाकर अपने मोरल ट्यूटर को बता दे—जो दरअसल वही आदमी था जिसे वो पसंद नहीं था।
और बस, सब कुछ इसी तरह था। इसी तरह, जब तक उसने अपनी कलाइयाँ नहीं काट लीं।
लेकिन इसका एक और पहलू भी होना ही था: सेक्स।
ऑक्सफ़र्ड की काली लड़कियाँ—चाहे अफ़्रीकी हों, वेस्ट इंडियन हों या अमरीकी—हम रोडेशिया वालों को हिकारत से देखती थीं। आख़िर हमने अभी तक अपनी आज़ादी जीती ही कहाँ थी। आख़िर अख़बारों में यही छपता था कि हम हर वक़्त आपस में लड़ते रहते हैं। और फिर वे तमाम वजहें, जिन्हें काली लड़कियाँ मान लेना चाहती थीं। कुल मिलाकर मामला हमारे हक़ में बिल्कुल नहीं था। हम अफ़्रीका के यहूदी बन चुके थे—बल्कि हैं—और हमें कोई नहीं चाहता था। गोरे हरामज़ादों की हिकारत झेलना एक बात है; लेकिन जब एक काली बिल्ली दूसरी काली बिल्ली पर नाक चढ़ाए, तो बात कुछ और ही पागल कर देने वाली हो जाती है। और यह बात उसे सीखनी थी।
मुझे न इधर से मतलब था, न उधर से। दारू लड़कियों से बेहतर थी, काली लड़कियों से भी। और माल तो जन्नत था। मगर वो परेशान रहता। फिर उसने अपने को एक वेस्ट इंडियन लड़की के चक्कर में उलझा लिया, जो रसोई में काम करती थी। मैं उसे जितना जानता था, उस हिसाब से यह “नीचे गिरना” कम-से-कम उसे तोड़ देने वाली बात थी।
“लेकिन हम सब काले हैं,” उसने ज़िद की।
फिर वही हुआ: वाइन खुली और सुबह तक चलती रही।
“यह तो वैसा ही है जैसे तुम नेशनल फ्रंट के किसी गुंडे से कहो कि हम सब इंसान हैं,” मैंने कहा।
“शायद उनके लिए काले मर्द काफ़ी नहीं हैं,” उसने विरोध किया। “शायद वे दिन भर बस यही सपना देखती रहती हैं कि कोई गोरा छोकरा आकर उनकी चूलें कस दे। शायद...”
“सुना है तुम रोज़ रसोई के चक्कर काट रहे हो।”
वो सीधा बैठ गया।
मैं सचमुच अब एक दोस्त खो रहा था।
मगर उसने जवाब में बस एक भारी, दुखांत-सी साँस भरी। और पहली बार—जिसका मैं कब से इंतज़ार कर रहा था—उसके मुँह से अचानक गालियों की एक बौछार निकली।
“अब से या तो गोरी लड़कियाँ, नहीं तो कुछ नहीं।”
“वो तुम पहले भी आज़मा चुके हो,” मैंने याद दिलाया।
उसने कुर्सी के हत्थे कसकर पकड़ लिए। फिर धीरे-धीरे उसके फेफड़े जैसे पिचक गए।
“मर्दों को क्यों नहीं आज़माते?” मैंने अपना गिलास फिर भरते हुए कहा।
वो मुझे घूरता रह गया।
और उसने थूकते हुए कहा, “तुम्हारे अंदर गंदगी भरी है, पता है?”
“मुझे बहुत दिनों से शक था,” मैंने कहा, मेरी दिलचस्पी अब उतर रही थी। फिर भी आख़िरी सिक्का मैंने फेंक दिया।
“या फिर सीधे मुट्ठ मारो। हम सब वही करते हैं।”
ग़ुस्से में उसने अपना गिलास फिर भर लिया।
हम देर तक चुपचाप पीते रहे। एक लंबा घंटा बीत गया।
“वे मुझे कॉलेज से निकालने वाले हैं,” मैंने कहा।
“क्या?”
उसका सचमुच हैरान लगना उसके भलेपन में गिना जा सकता था।
“अगर मैं अपनी मर्ज़ी से वॉर्नफर्ड में भर्ती होने से इनकार कर दूँ,” मैंने जोड़ा।
“वॉर्नफर्ड क्या है?”
“एक साइकेट्रिक केयर यूनिट,” मैंने कहा। “आज दोपहर तक का वक़्त है मेरे पास। या तो अपनी मर्ज़ी से बंदी बनो, या कॉलेज से बाहर जाओ।”
वॉर्डन का नोट मैंने उसकी तरफ़ उछाल दिया। उसने खोलकर पढ़ा। फिर सीटी बजाई। उसकी सीटी की वह आवाज़ ऐसी थी कि लगभग मन हुआ उसे सब कुछ माफ़ कर दूँ।
आख़िर उसने पूछा, “तो तुमने क्या तय किया है?”
“निकाल दिया जाना।”
“लेकिन...”
मैंने काट दिया।
“मेरी ज़िंदगी का यह अकेला फ़ैसला है जिसके बारे में मुझे मालूम है कि सही निकलेगा।”
“इंग्लैंड में ही रहोगे?”
“हाँ।”
“अफ़्रीका जाकर हमारे गुरिल्लाओं में क्यों नहीं शामिल हो जाते? तुम हमेशा मुझसे ज़्यादा रेडिकल रहे हो, और यह तुम्हारे लिए एक मौक़ा होगा कि ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला...”
मैंने जंभाई ली।
“तुम्हारा गिलास खाली है,” मैंने कहा। “लेकिन वैसे भी ज़रा ठीक से देखो। मुझे देखो। मेरे बारे में जो कुछ जानते हो, उसे देखो। फिर बताओ, क्या तुम्हें मुझमें कोई समर्पित गुरिल्ला दिखाई देता है?”
उसने देखा।
मैंने उसका गिलास फिर भर दिया और दूसरी बोतल खोल ली। वह मुझे गौर से परखता रहा। फिर उसका चेहरा चमका, लगभग बदनीयती से।
“तुम एक आवारागर्द हो,” उसने ठोस आवाज़ में कहा। “तुम बिल्कुल उस निगर आवारागर्द जैसे हो, जो उस दिन रास्ते में मुझसे आ टकराया था जब हम...”
“मुझे पता है,” मैंने डकार लेते हुए कहा।
वो मुझे देखता रह गया।
“तो करोगे क्या?”
“लिखूँगा।”
“जियोगे कैसे?”
“कल अपना इंतज़ाम ख़ुद कर लेगा। उम्मीद है,” मैंने कहा।
और वह आख़िरी बार था जब हमने वाइन की बोतलों के साथ, रात के उन छोटे घंटों में, एक-दूसरे से बाक़ायदा बात की। फिर साफ़ धूप लंबी खुली खिड़कियों से धार बनकर अंदर आने लगी। मैं उसे कुर्सी पर सुकून से सोता छोड़कर कॉलेज में अपने आख़िरी नाश्ते के लिए जल्दी-जल्दी निकल गया।