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पैदा होने की असुविधा - अध्याय 1

पैदा होने की असुविधा - अध्याय 1

एमिल सिओरन की पुस्तक 'The Trouble with Being Born' एक गहन दार्शनिक रचना है जिसमें उन्होंने अस्तित्व और जन्म की विडंबनाओं पर विचार किया है। इस पुस्तक में सिओरन ने जीवन की अनिवार्यता और उसके साथ जुड़ी व्यर्थता का विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, जन्म लेना एक प्रकार की त्रासदी है, और वे इस बात को विभिन्न आत्म-मननशील और निराशावादी टिप्पणियों के माध्यम से प्रकट करते हैं। इस पुस्तक में दर्शाए गए विचार जीवन के प्रति एक गहरी संवेदनशीलता और अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं, जिससे यह दर्शन के छात्रों और विचारशील पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण पठन बन जाता है। यह उस पुस्तक का पहला अध्याय है।

एमिल सिओरन
आतंकवाद: उनका और हमारा

आतंकवाद: उनका और हमारा

एकबाल अहमद आतंकवाद के विषय पर बात करके बताते हैं कि आतंकवाद को किन तरीकों से रोका जा सकता है: दोहरे मापदंडों के अतिरेक से बचें। अगर आप दोहरे मापदंड अपनाते हैं, तो आपको भी दोहरे मापदंडों से ही जवाब मिलेगा। इसका इस्तेमाल मत करें। अपने सहयोगियों के आतंकवाद का समर्थन न करें। उनकी निंदा करें। उनसे लड़ें। उन्हें सज़ा दें। कारणों पर ध्यान दें और उन्हें सुधारने की कोशिश करें। समस्याओं के मूल कारणों को समझें और हल निकालें। सैन्य समाधान से बचें। आतंकवाद एक राजनीतिक समस्या है, और इसका समाधान राजनीतिक होना चाहिए। राजनीतिक समाधान खोजें। सैन्य समाधान समस्याएं बढ़ाते हैं, सुलझाते नहीं। कृपया अंतरराष्ट्रीय क़ानून के ढांचे को मज़बूत करें और उसे सुदृढ़ बनाएं।

एकबाल अहमद

कहानियाँ

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मेरे भतीजे के नाम पत्र

अमरीकी काले युवाओं को संबोधित यह ख़त जेम्स बाल्डविन ने पचास साल पहले लिखा था। इस ख़त की प्रासंगिकता अमरीका में आज भी वैसी ही है जैसी कि इसके लिखते समय थी, साथ ही यह ख़त हिंदुस्तान के जातिवादी समाज के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। हिंदुस्तान में भी सैंकड़ों युवाओं को केवल इसलिए मार दिया जाता है कि वे अपनी जाति, पहचान और सामाजिक दर्जे से अलग हटकर कुछ नया करना चाहते हैं। वे बताना चाहते हैं कि समाज ने जो पहचान उन पर थोप दी है, वे उससे कहीं बेहतर है। लेकिन हमारा समाज इस आवाज़ को बस्तियों में ही दबाकर ख़त्म कर देना चाहता है। बिना किसी अपराधबोध के, पूरी निर्दोषता के साथ। ऐसे अपराधी खुद के ऊंची जाति में होने का फायदा उठाते हैं और विभिन्न तरीकों से जातिवाद को बरकरार रखने के लिए सक्रिय रहते हैं। लेकिन अगर आप इनसे कभी जाति की बात करते हैं तो कहते हैं कि ‘बड़े कड़वे’ हो रहे हो। निचली जातियों के प्रतिरोध से ऊंची जाति के लोगों को डर लगता है। उनको डर लगता है कि वे अपनी पहचान खो देंगे। ऊंची जाति का होना उनकी पहचान है, और ज़ाहिर है कि जातिवाद का विनाश होने पर उनकी यह पहचान भी नहीं रहेगी। इसके विपरीत एक जो सवाल पैदा होता है वह यह है कि क्या हर पहचान पवित्र है? क्या हमें ऐसी पहचानों को नहीं ठुकराना चाहिए जो दूसरों के शोषण का आधार बनती हों? यह लेख सिर्फ़ अमरीका के काले युवाओं के लिए ही नहीं, यह हिंदुस्तान के दलित, मुसलमान, आदिवासी और अन्य सभी पिछड़ी जाति के युवाओं के लिए भी है। यह लेख दुनिया के उन सभी युवाओं के लिए है जो अपने-अपने देश और समाज में नस्लवाद और जातिवाद जैसी घिनौनी व्यवस्थाओं और धारणाओं से पीड़ित हैं। ऐसे युवाओं के लिए बाल्डविन के यह शब्द तब तक याद रखने लायक रहेंगे जब तक नस्लवाद और जातिवाद का पूरी तरह से खात्मा नहीं हो जाता: ‘जो भी वे मानते हैं, करते हैं और उसे तुम्हें भोगने पर मजबूर करते हैं, वह तुम्हारी हीनता को बयान नहीं करता, बल्कि उनकी अमानवीयता और डर को उजागर करता है।’

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लेख

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पैदा होने की असुविधा - अध्याय 1

पैदा होने की असुविधा - अध्याय 1

एमिल सिओरन की पुस्तक 'The Trouble with Being Born' एक गहन दार्शनिक रचना है जिसमें उन्होंने अस्तित्व और जन्म की विडंबनाओं पर विचार किया है। इस पुस्तक में सिओरन ने जीवन की अनिवार्यता और उसके साथ जुड़ी व्यर्थता का विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, जन्म लेना एक प्रकार की त्रासदी है, और वे इस बात को विभिन्न आत्म-मननशील और निराशावादी टिप्पणियों के माध्यम से प्रकट करते हैं। इस पुस्तक में दर्शाए गए विचार जीवन के प्रति एक गहरी संवेदनशीलता और अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं, जिससे यह दर्शन के छात्रों और विचारशील पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण पठन बन जाता है। यह उस पुस्तक का पहला अध्याय है।

एमिल सिओरन
आतंकवाद: उनका और हमारा

आतंकवाद: उनका और हमारा

एकबाल अहमद आतंकवाद के विषय पर बात करके बताते हैं कि आतंकवाद को किन तरीकों से रोका जा सकता है: दोहरे मापदंडों के अतिरेक से बचें। अगर आप दोहरे मापदंड अपनाते हैं, तो आपको भी दोहरे मापदंडों से ही जवाब मिलेगा। इसका इस्तेमाल मत करें। अपने सहयोगियों के आतंकवाद का समर्थन न करें। उनकी निंदा करें। उनसे लड़ें। उन्हें सज़ा दें। कारणों पर ध्यान दें और उन्हें सुधारने की कोशिश करें। समस्याओं के मूल कारणों को समझें और हल निकालें। सैन्य समाधान से बचें। आतंकवाद एक राजनीतिक समस्या है, और इसका समाधान राजनीतिक होना चाहिए। राजनीतिक समाधान खोजें। सैन्य समाधान समस्याएं बढ़ाते हैं, सुलझाते नहीं। कृपया अंतरराष्ट्रीय क़ानून के ढांचे को मज़बूत करें और उसे सुदृढ़ बनाएं।

एकबाल अहमद
जातिवाद और प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण

जातिवाद और प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण

प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण की बात आने पर भारत में बवाल उठ जाता है। तर्क छोड़ कर लोग तरह-तरह की भावनात्मक बातें करने लगते हैं। मेरिट या योग्यता को पिटारे से निकाल कर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगता है। जबकि आरक्षण के विरोधियों के पास डाटा-आधारित सामाजिक या आर्थिक दलीलें नहीं हैं, वे फिर भी ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला कर अपनी बात मनवाने पर अटल हैं। अगर वाद-विवाद से बाहर निकलकर आरक्षण के बारे में कुछ जानना चाहते हैं, तो इस लेख को पढ़ के जानिए की प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण क्यों जरूरी है। अगर आप कुछ सीख कर इस पहल के समर्थक बनना चाहते हैं तो राहुल सोनपिम्पले द्वारा संस्थापित All India Independent Scheduled Castes Association (AIISCA) से जुड़िये और उनकी जो मदद कर सकें वो करिए। https://aiisca.org

मीरा नंदा
बेनकाब हुआ अल्जीरिया

बेनकाब हुआ अल्जीरिया

बुरके और हिजाब को लेकर आज कल हिंदुस्तान में काफी बवाल चल रहे हैं। यह सब नया नहीं है। औरतों के ऊपर काबू पाने और रखने की राजनीति बहुत पुरानी है। यहां के हिंदुओं के प्रहार के सामने मुसलमान औरतें क्यों नकाब पहनती हैं या उतारती हैं, वह समझने में हमें यह लेख मदद कर सकता है। इस लेख में फ़्रांस के प्रहार के आगे अल्जीरिया की औरतों के बर्ताव को समझाया गया है। नकाब पहनना या उतारना औरतों के लिए इतना जरूरी नहीं है जितना कि वह न करना है जो कि उनके दुश्मन उनसे करवाना चाहते हैं। उसके अलावा, नकाब पहनना या उतरना एक भावुक विकल्प नहीं, बल्कि एक रणनीतिक विकल्प है।

फ्रांत्ज़ फ़ैनोन

अनुवादक

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शहादत

शहादत ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंबेडकर कॉलेज से बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता में किया। दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही देशबंधु कॉलेज से एम.ए. (हिंदी) किया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में प्रुफ रीडर, हिंदी टाइपिस्ट और अनुवादक की पोस्ट से की। इसके बाद वह दो साल एनडीटीवी इंडिया में कार्यरत रहे। वर्तमान में वह फ्रीलांस ‘इंग्लिश से हिंदी’ और ‘उर्दू से हिंदी’ अनुवादक के तौर पर काम करते हैं। गुजिश्ता सालों में इनकी कहानियां हिंदी साहित्य की चर्चित और स्थापित पत्रिकाओं हंस, कथादेश, कथाक्रम, पहल, मधुमति, वनमाली, विभोम स्वर, नया ज्ञानोदय, जानकीपुल.कॉम, समालोचन.कॉम, उद्भावना, माटी, पाखी, परिकथा और अहा!ज़िंदगी में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कहानियों के अनुवाद अंग्रेजी की प्रसिद्ध पत्रिकाओं ‘आउट ऑफ प्रिंट’ और ‘बॉम्बे लिटरेरी मैगजीन’ में प्रकाशित हो चुके हैं। शहादत का कहानी संग्रह ‘आधे सफ़र का हमसफ़र’ प्रकाशित हो चुका है। इनका दूसरा कहानी संग्रह ‘कर्फ़्यू की रात’ लोकभारती प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशय है। अनुवादक के तौर पर शहादत ने हिजाब इम्तियाज़ अली की कहानियों के संग्रह सनोबर के साए और ज़हीर देहलवी की आत्मकथा दास्तान-ए-1857, जो पहले स्वतंत्रता संग्राम पर लिखी गई ऐतिहासिक किताब है, का उर्दू से हिंदी अनुवाद किया है। उन्होंने मकरंद परांजपे की किताब ‘गांधी की हत्या और उसके बाद का उनका जीवन’ का भी अनुवाद किया है, जो पेंग्विन इंडिया से शीघ्र प्रकाशय है।

सौरभ कुमार

सौरभ कुमार पेशे से पत्रकार और दिल्ली के एक स्कूल में सिनेमा पढ़ाने का काम करते है। सौरभ कुमार ओपिया फिल्म्स के संस्थापक और बोलती मीडिया फाउंडेशन के सह-संस्थापक हैं। वे मुंबई, भारत में रहने वाले सात साल से ज़्यादा के अनुभव वाले मल्टीमीडिया पत्रकार, कंटेंट क्रिएटर और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता हैं। उन्होंने पब्लिक बोलती की भी सह-स्थापना की, जो एक नागरिक पत्रकारिता और वकालत मंच है, जिसने कोविड-19 महामारी के दौरान प्रवासी मज़दूरों के लिए धन जुटाने में मदद की, यात्री ट्रेनों में उनके लिए भोजन जुटाया, ईंट भट्टों से बंधुआ मज़दूरों को बचाया और विशिष्ट स्थानों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों से जवाबदेही सुनिश्चित की। वे भारत में औपनिवेशिक युग के राजद्रोह कानून के बारे में एक ब्लॉग, रिपील सेडिशन पहल का भी हिस्सा थे। उनके बारे में और उनके काम को और जान्ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: https://opiafilms.com/